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इमाम अली ने कहा मुनाफीक़त ये नहीं के जो तुम्हें बुरा लगे उसे फौरन बुरा कह दो

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इमाम अली ने कहा मुनाफीक़त ये नहीं के जो तुम्हें बुरा लगे उसे फौरन बुरा कह दो

ह़ज़रत इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु
के खीदमत में एक शख्स आया और अर्ज़ करने लगा.या अली मुझ से मुनाफीक़त बर्दाश्त नहीं होता,मैं सबसे सच कहता हूं,लेकिन यह ज़माने वाले मेरे सच को क़ुबूल नहीं करते,और मेरे दुश्मन बन जाते हैं.तो मैं क्या करूं.
तो इमाम आली मकाम रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु ने फरमाया ऐ शख्स जहां‌ सच बोलने से तुम्हारे दुश्मन होते हो वहां खामोश रहके अपने दोस्त बना लो…
क्योंकि पानी कितना भी गंदा हो लेकिन आग बुझाने के लिए काफी होता है.लेकिन दोस्त कितने भी बुरे हो वह जिंदगी में कभी न कभी काम जरूर आते हैं.
अपनी शख्सियत को इतना बावाकार बनाओ जब जिंदा रहो तो लोग मिलने को मुस्ताक रहे जब मर जाओ तो लोग तुम्हें अच्छी अल्फाजों के साथ याद करें.
उस शख्स ने कहा या अली तो क्या यह मुनाफीक़त नहीं होगी कोई मुझे बुरा लगे और मैं उसे बुरा ना कहूं.
तो इमाम अली ने कहा मुनाफीक़त ये नहीं के जो तुम्हें बुरा लगे उसे फौरन बुरा कह दो बलके मुनाफीक़त यह है जो तुम्हें बुरा लगे तुम दिल में उसका मैल रखो.
और फिर उस से दुश्मनी करके उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करो.अल्लाह की किसी मखलुक़ को नुकसान पहुंचाने को मुनाफीक़त कहते हैं.इमाम अली ने कहा मुनाफीक़त ये नहीं के जो तुम्हें बुरा लगे उसे फौरन बुरा कह दो
बाकी तुम्हारे सामने अगर कोई गलत कर रहा है तुम उसकी गलती को देख कर बर्दाश्त कर रहे हो सबर कर रहे हो यह मुनाफीक़त नहीं बल्के सुजाअत है.
बुरे का अंजाम खुद बुरा होगा अच्छे इंसान की अच्छाई का सिला अल्लाह आता करेगा..
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