इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह ताअला अन्हु के दौर का एक वाकया.in hindi.

इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह ताअला अन्हु के दौर का वाकया.
बेशक हर एक नेकी से अफज़ल नमाज़ है.
यानी नबी के आंखों की ठंडक नमाज है.
सैदा ए मुस्तफा को मिली जितनी अज़मतें.
है इसी नमाज़ मुबारक की बरकतें.
एक शख्स अपने बेटे को इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह ताअला अन्हु की खिदमत में लेकर आया और दस्तेअदब को जोड़कर अर्ज़ करने लगा,
ऐ नवासा ए रसूल ﷺ मेरा बेटा नमाज़ नहीं पढ़ता इसे नसीह़त करें,इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह ताअला अन्हु ने उस बच्चे को देखा और फ़रमाया ऐ बेटा तुम्हें पता है मैं कौन हूं?
बच्चे ने कहा हां हां आप रसूल अल्लाह ﷺ के नवासे हैं,और जन्नत के सरदार हैं.
इमाम हुसैन ने फ़रमाया और तुम्हें पता है हमे क्या चिज़ अज़ीज़ है क्या चीज़ पसंद है बच्चे ने कहा नहीं मुझे यह मालूम नहीं.
इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह ताअला अन्हु ने कहा मुझे जन्नत से ज्यादा नमाज़ अज़ीज़ है.
उस बच्चे ने कहा जन्नत से ज्यादा नमाज़ अज़ीज़ है! वोह क्युं?
इमाम हुसैन ने कहा बेटा क्योंकि जन्नत में मेरा नफ्स खुश होगा.
लेकिन नमाज़ में मेरा रब खुश होगा.
अरे मेरे हज़ारों खुशियां अल्लाह के एक रिज़ा पर कुर्बान.बस यह सुनना था!
तो वह बच्चा कहने लगा ऐ नवासा ए रसूल आज से मै एक भी नमाज़ कज़ा नहीं करूंगा.
और ताअबद ताह़यात नमाज़ पढ़ता रहूंगा.
आपने मुझे नमाज़ की अहमियत समझा दी,पूरी जिंदगी वह नमाज़ पढ़ता रहा और कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन के कदमों में कुर्बान हो गया उस बच्चे का नाम जॉन था सलाम हो कर्बला के शहीद ह़ज़रत जौन पर.
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