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उर्दू ज़ुबान के बारे में

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उर्दू ज़ुबान के बारे में

उर्दू जुबान के बारे में हिंदुस्तान एक बहुत ही बड़ा मुल्क है इसमें बेशुमार कौमें आबाद है।जीनकी रंग-बिरंगे जुबानी हैं। लेकिन हिंदुस्तान की जिस जुबान का झंडा सबसे ऊंचा है वह उर्दू है।

देखिए एक सीख दूसरे सीख से पंजाबी जुबान में बात करता है लेकिन वही सीख अगर बंगाली डॉक्टर से गुफ्तगू करना चाहे तो उसे पंजाबी के बजाय उर्दू बोलना पड़ेगा।

सिंधी लोग अपने घर के चार दीवारों में सिंधी जुबान इस्तेमाल करते हैं लेकिन जब दुकान पर बैठते हैं तो ग्राहकों से उर्दू जुबान में बात चीत करते हैं।उर्दू जुबान के बारे में

मारवाड़ी लोग अपने बाल बच्चे से तो गुजराती बोलते हैं लेकिन रेलवे स्टेशन पहुंचकर उन्हें उर्दू जुबान से काम लेना होता है।

महाराष्ट्र के रहने वाले अपने बिरादरी में मराठी बोलते हैं लेकिन सीख ड्राइवरों से बातचीत करने के लिए उन्हें टूटी-फूटी उर्दू ही का सहारा लेना पड़ता है।

राज नेपाल के पहाड़ी बाशिंदे अपने बाल बच्चों से नेपाली जुबान बोलते हैं लेकिन बस कंडक्टर से टिकट मांगते वक्त उनको नेपाली के बजाय उर्दू बोलना पड़ता है।

बंगाली TT अपने हम वतन से बंगला में बातचीत करते हैं मगर ट्रेन के पैसेंजरों से जब उसे गुफ्तुगू की जरूरत पड़ती है तो बेधड़क उर्दू बोलता जाता है।उर्दू जुबान के बारे में

इससे पता चला कि हिंदुस्तान की मुख्तलिफ बिरादरियों और कौमों के दरमियान मेल जोल और बातचीत का जरिया शरीफ उर्दू जुबान है यही वह जुबान है जिसने पूरे हिंदुस्तान को एक लड़ी में पिरोए रखा है।

उर्दू जुबान की बुनियाद उस वक़्त पड़ी है जब ह़जरत सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने पंजाब फतह करके उसे गज़नवी हूकूमत का एक सोबा क़रार दीया। और लाहौर में अपनी फौजी मुस्तकिल तौर पर मुतइयन की।उर्दू जुबान के बारे में

अब यहां मुसलमान सिपाहियों फौजी अफसरों Saudagar पैसे वालों की आबादीयां क़ायम हो गई।

मुसलमानों की मादुरी जुबान फारसी थी और हिंदुओं की बोली हिंदी थी।

उर्दू ज़ुबान के बारे में

जब इन दोनों कामों का एक साथ रहन-सहन हुआ और आपस में एक दूसरे के साथ जरूर याते जिंदगी के तालुकात बढे़ तो फारसी और हिंदी मीलकर एक तीसरी जुबान का वजूद हुआ जो हिंदू और मुसलमानों के मस्तक का जुबान है और आज जिसे उर्दू कहा जाता है।

पंजाब पर हजरत सुल्तान महमूद गजनबी की नस्ल तकरीबन 200 बरस तक हुकूमत करती रही इस तबील मुद्दत में मुसलमानों और हिंदुओं के तालुकात बहुत वसी हो गए जिसकी बदौलत उर्दू ज़बान की बुनियाद मजबूत होती गई।

फिर सुल्तान शहाबुद्दीन महमूद गजनवी ने पंजाब पर हमला करके गजनबी हुकूमत खत्म कर दी और अपने हुकुमत कायम की।

चंद साल गुजरने के बाद उसने दिल्ली और अजमेर भी पतह करके इन्हें गौरी सल्तनत में शामिल किया।

603 हिजरी मुताबिक 1206 ईस्वी में जब सुल्तान शहाबुद्दीन का इंतकाल हो गया तो सुल्तान के गुलाम जज़ल कुतुबुद्दीन को हिंदुस्तान का बादशाह मुंतख़ब किया गया।

उर्दू ज़ुबान के बारे में

सुल्तान कुतुबुद्दीन ने लाहौर को दारू सल्तनत बनाया और बिहार बंगाल तक अपने हुकूमत वसी।

यह सुल्तान हिंदुस्तान का पहला मुसलमान बादशाह कहलाता है। इसी के समय में हिंदुस्तान में एक मुस्लिम हुकुमत कायम हुई जो बाहर के किसी मुल्क के मातहत नथी।

सुल्तान कुतुबुद्दीन के इंतकाल के तकरीबन साल भर के बाद इसके दामाद हजरत शमसुद्दीन अल्तमश तख्ते हुकूमत पर बैठे। उन्होंने लाहौर के बजाय दिल्ली को राजधानी करार दिया और बिहार बंगाल को दोबारा फतह करने के बाद और उरीशा को भी अपनी हुकूमत में शामिल किया।

हिंदुस्तान की या मुस्लिम हुकूमत तकरीबन सारे 6 बरस तक कायम रहे इस दरमियान में तख्त दिल्ली पर मुख्तलिफ खानदानों के बादशाह बैठकर हुकूमत करते रहे।

जब दिल्ली के मुसलमान बादशाहों की फयाज़ी दरियादिली कद्र दानी का चर्चा, ईरान, तुरान, खुरासान, बुखारा, काबुल, तुर्किस्तान, पहुंचा तो वहां से हजारों तिजारत पैसा अपने हुनर मुसलमान का काफिला अपना अपना वतन छोड़कर हिंदुस्तान की तरफ आता रहा

और मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों में आबाद होता गया। फिर इन मुसलमानों का सबिका हर जगह हिंदू पड़ोसियों से था इसलिए इन दोनों कौमों की आपस में सब रोज बातचीत से उर्दू जुबान खूब फलती-फूलती रही।
यहां तक कि मुगल दौरे हुकूमत में यह जुबान पंजाब दिल्ली यूपी बिहार गुजरात दक्कन वगैरा इलाकों पर छा गई।

यह याद रहे की उर्दू जुबान के बढ़ने और फैेलने में दिल्ली के मुस्लिम बादशाहों का कोई हिस्सा नहीं था इनकी हुकूमत की जुबान फारसी थी।

सल्तनत के सारे कारोबार फारसी जुबान में अंजाम पाते थे।

उर्दू ज़ुबान के बारे में

हां हिंदुस्तान के सूफिया ओलमा और सोहरा का उर्दू जुबान पर जरूर एहसान है।
सुफिया कीराम के वाज़ तकरीर नसीहत की मजलिस में अवाम से उर्दू में कलाम फरमाते। हजरात ओलमा उर्दू में मजहबी किताब ए लिखते थे शायर उर्दू जुबान में नज्में लिखते और सुनाते थे।

मोग़ल हुकूमत खत्म करने के बाद अंग्रेजों ने हिंदुस्तान में अपनी सल्तनत कायम कि तो उन्होने इब्तिदा में हुकूमत की फारसी जुबान रखी लेकिन अंग्रेजों गवर्नर ने मुल्क में उर्दू का जोर देखकर 1248 हिजरी मुताबिक 1832 ईसवी में हुकूमत की जुबान फारसी के बजाय उर्दू कर दी।

इस तरह या जुबान ,तहसील, डाकखाना, थाना, कचहरी, वगैरा माकामात पर भी फैल गई।

अंग्रेज ने शहर कोलकाता में 10 ज़ीलहीजा 1214 हिजरी मुताबिक 4 मई 18 ईस्वी को एक मदरसा फोर्ट विलियम कॉलेज नाम का कायम किया जिसमें इंग्लैंड से आने वाले अंग्रेज अफसरों को हिंदुस्तानी जु़बान की तालीम दी जाती थी।

और इन्हें हिंदुस्तानी रशम रेवाज से खूब वाकिफ किया जाता था ताकि वह अपने फर्ज अंजाम देने में ठोकर ना खाए।

उर्दू ज़ुबान के बारे में

फिर आगे चलकर इस कॉलेज में विश्व योग उर्दू किताबें नए तर्ज में लिखवाकर छपवाई, और हर तरफ इनकी करके जदीद उर्दू बोलने लिखने का रिवाज कायम किया।

इससे पहले लोग कदीम उर्दू में किताबें लिखते थे।
कदीम उर्दू एक बोझल ज़ुबान थी लेकिन फोर्ट विलियम कॉलेज के कोशिश ने उर्दू को एक न्याय दो ही साफ जुबान के सफ में खड़ा कर दिया।

कॉलेज के अंग्रेज सदर डॉक्टर गुल करीस्ट ने जदीद उर्दू के प्रयोग के लिए खुद भी कई किताबें अपनी कलम से लिखकर साए कीए।

फिर दूसरी लिखने वालों ने भी इस नए तर्ज को एक एखतीयार किया,

यह क्लियर रहेै कि अंग्रेज इस मुल्क के बाशिंदे नहीं थे, इनका वतन तो यहां से बहुत दूर सात समुंदर पार इंग्लैंड में था। यह बिल्कुल खुली बात है, विदेशी होने की वजह से इनको यहां की किसी जुबान से न मोहब्बत हो सकती थी और ना नफरत, तो फिर उन्होंने उर्दू जुबान के फैलाने और तरक्की देने में भरपूर कोशिश क्यों की।

उर्दू को इतना बढ़ावा क्यों दिया कि खुद बढ़ाया दूसरों को बढ़ावाया और किताबें लिखी, और लिखवाई और फिर अपनी अंग्रेजी हुकूमत की जुबान भी उर्दू कर दी।

बात यह है कि अंग्रेजों ने देखा कि पूरे हिंदुस्तान में मकबूल आम जुबान सिर्फ उर्दू है। इस जुबान की मदद से हिंदुस्तानी रियाया पर हुकूमत करना आसान है। इसलिए उन्होंने इस जुबान के फरोग पर पूरा जोर लगाया और कामयाब रहे।

उर्दू ज़ुबान के बारे में

जब हिंदुस्तान में परेस कायम हुआ और किताबें मशीन के जरिया छपना शुरू हुए तो उस वक़्त से उर्दू किताबें लिखने का रिवाज बहुत फैला।

मुसलमानों अंग्रेजों हिंदुओं और सिखों में बड़े-बड़े साहिब कलम पैदा हुए जिनकी उर्दू किताबें ढाका से गुजरात और कश्मीर से दक्कन तक हिंदुस्तान के कोने कोने में पहुंचे,
इस तरह उर्दू जुबान बोल चाल लिखने पढ़ने के मैदान में सबसे आगे हो गई।

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