Home इतिहास एक गुलाम लड़का बादशाह बन गया बहुत ही दिलचस्प वाक्या।

एक गुलाम लड़का बादशाह बन गया बहुत ही दिलचस्प वाक्या।

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एक गुलाम लड़का बादशाह बन गया बहुत ही दिलचस्प वाक्या।

एक गुलाम लड़का बादशाह बन गया बहुत ही दिलचस्प वाक्या.एक बार की बात है,एक ताजिर गुलामों की मंडी में गया, तो उसे एक तुर्क बच्चा बहुत पसंद आया, और उसे ताजिर ने फौरन खरीद लिया,
ताजिर ने बच्चे से पूछा तुम्हारा नाम क्या है, बच्चे ने कहा जनाब मैं अपना नाम बता कर अपने नाम की तौहीन नहीं करना चाहता,
मैं एक गुलाम हूं और आप मुझे जिस नाम से पुकारेंगे वही मेरा नाम होगा, ताजिर को यह बात सुनकर हैरत हुई लेकिन उसे यह बात पसंद भी आई, के बच्चे में इज्जते नफ्स का एहसास बाकी है।
ताजिर ने उस बच्चे पर खास तवज्जो दी, और उसके तालीम और तरबियत का इंतजाम किया, बच्चे ने बहुत जल्द,तीरंदाजी,तलवारबाजी ,तलवारबाजी ,घुरसवारी में महारत हासिल कर ली के खुद ताजिर हैरान रह गया।
गजनी के बादशाह शहाबुद्दीन गौरी, एक बार घोड़ों की दौड़ का मुकाबला देख रहा था। ताजिर अपने गुलाम कोे लेकर उसके पास पहुंचा, और कहां हजूर हमारी इस गुलाम को घुड़सवारी में कोई नहीं हरा सकता।
बादशाह ने मुस्कुराकर लड़के से पूछा तुम कितना तेज घोड़ा दौड़ा सकते हो, लड़के ने निहायत अदब से जवाब दिया, हुजूर घोड़े को ज्यादा तेज दौड़ाने से जरूरी,
उसे अपना मती बनाना होता है।
गौरी ने चौंक कर उसे देखा और उसे एक बेहतरीन घोड़ा देते हुए कहा, लड़के तुम इस घोड़े को अपना मती और फरमाबरदार बना कर दिखाओ,
लड़का उछलकर घोड़े पर बैठा और कुछ दूर उसे चला कर ले गया, और फिर पलट कर वापस आया, लोग यह देखकर हैरान रह गए, की वापसी में भी घोड़ा अपने समूह के निशान पर ही चलता हुआ आया।
सुल्तान ने सोचा जो शख्स इस तरह जानवर को अपना फरमाबरदार बना सकता है। उसके लिए इंसानों को मती बनाना क्या मुश्किल हो सकता है।
उसने फौरन उस गुलाम को खरीद लिया, जिसका नाम कुतुबुद्दीन था, कुतुबुद्दीन ने हिंदुस्तान पर की सालों तक हुकूमत की और दिल्ली की कुवत उल इस्लाम मस्जिद, और कुतुबमीनार उसी की यादगारे हैं।
कुतुबुद्दीन बहुत सखी बादशाह था। एक मर्तबा एक गरीब उसके दरबार में आया, और उसने कहा मैंने सुना है कि ₹100000 एक लाख रुपए किसी जगह रख दिया जाए, तो उस से सिक्कों का इतना बड़ा ढेर लग जाता है, के सिक्कों के साए में एक कुत्ता बैठ सकता है।
और मैंने कभी भी ₹100000 एक लाख रुपए नहीं देखे,
कुतुबुद्दीन ने फौरन हुकुम दिया कि 100000 एक लाख सिक्कों का ढेर लगाया जाए, वह गरीब बहुत देर तक उस ढेर को देखता रहा, और फिर बादशाह का शुक्रिया अदा किया।
और एक ठंडी सांस लेकर वापसी के लिए रवाना हो गया।
बादशाह ने उस से पुकार कर बुलाया और कहा तुम कहां जा रहे हो, अपने पैसे तो लेते जाओ, और ₹100000 एक लाख रुपए उसे आता कर दिए।
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