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दूसरों की पीड़ाएँ आपको अपने जीवन के वरदान गिनने के लिए प्रेरित करती हैं।

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दूसरों की पीड़ाएँ आपको अपने जीवन के वरदान गिनने के लिए प्रेरित करती हैं।

दूसरों की पीड़ाएँ आपको अपने जीवन के वरदान गिनने के लिए प्रेरित करती हैं।

मुझे शारीरिक व मानसिक पीड़ाओं से निबटने का सबसे उचित तरीका सार्वभौमिक सोच लगता है। मेरे कहने का अर्थ यह है कि जब हमें पीड़ा हो रही हो तो हम विश्व के उन 6 अरब लोगों के बारे में सोचें, जो विभिन्न शारीरिक व मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। उनके अनुभव निश्चित ही कड़वे रहे होंगे, लेकिन वे जीवन में सफल हुए। इसका अर्थ है कि आप भी चुनौतियों को पार अवश्य कर सकते हैं। —टॉम कनिंघम कई बार आप यह देखकर हैरान होंगे कि लोग जीवन में इतनी मुश्किलें कैसे सहन करते होंगे। दूसरों की पीड़ाएँ आपको अपने जीवन के वरदान गिनने के लिए प्रेरित करती हैं। कई लोग भावनात्मक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक पीड़ा में होते हैं; किंतु अपनी व्यथा छुपा लेते हैं। ‘ईश्वर की कृपा से मैं जीवन जी पा रहा हूँ, आगे बढ़ पा रहा हूँ’, एक बहुत ही सकारात्मक सोच है। कभी मेरे जीवन में अनेक समस्याएँ होती हैं तो कभी नहीं। कभी अधिक व्यस्तता तो कभी निश्चिंतता जब कभी मैं किसी और के अनुभवों एवं व्यवहार के बारे में विश्लेषण करता/करती हूँ तो मेरा मन इस सोच और दया से भर जाता है कि वह किन परिस्थितियों के कारण ऐसा कर रहा है। किसी दूसरे की परिस्थिति में जाकर आकलन करने में हम ज्यादा समझदार और दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इस वर्ष का मेरा उद्देश्य है कि मैं बिना सोचे-समझे किसी निर्णय पर न पहुँचूँ और न ही किसी को पहले से आँकने का प्रयास करूँ। जब कभी भी मुझे लगता है कि मैं दूसरे से बात न करूँ या उसकी मुश्किलें न समझूँ तो मैं स्वयं को याद दिलाता हूँ या दिलाती हूँ कि मैं स्वयं को उन परिस्थितियों में पा सकती हूँ। और क्या होगा, जब कोई मेरी परेशानियों को न सुने और न ही समझने का प्रयास करे? मैं कितना उपेक्षित महसूस करूँगा/करूँगी? सबसे ज्यादा तो मैं स्वयं को तुच्छ और नगण्य-सा महसूस करूँगा/करूँगी। एक शब्द में कहूँ तो अप-मानव। यह अत्यंत आवश्यक है कि आप सभी को सम्मान दें। यदि हम ऐसा आदर्श व्यवहार करते हैं तो वह सम्मान हमारे पास भी लौटकर आता है। यदि आप औरों को सम्मान देंगे तो आपको भी मिलेगा। कई लोग हर तरह से सक्षम होने पर भी विशेष मुरव्वतों की उपेक्षा करते हैं और सोचते हैं कि यह ‘विशेष दर्जा’ उन्होंने हासिल किया है। सच तो यह है कि वे इस दर्जे की माँग कर सकते हैं, इसीलिए करते हैं, बाकी जिन्हें सचमुच विशेष दर्जा मिलना चाहिए, इन सब बातों की उपेक्षा नहीं करते। ‘अधिकार’ शब्द उनके जीवन के शब्दकोश में नहीं होता। मैं उन लोगों की प्रशंसा में नतमस्तक होता/होती हूँ, जो आपको उनकी ओर दोबारा देखने की ओर विवश करते हैं; क्योंकि वे वह काम करते हैं, जो आपने नहीं किया। मसलन— 1. वे नियमों का अपवाद करते हुए विशेषाधिकारों की माँग नहीं करते। 2. वे लाचार नहीं दिखते। 3. वे स्वयं से ज्यादा दूसरों की आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान देते हैं। 4. लेने से पहले देने का भाव रखते हैं। 5. वे शिकायत करने से बचते हैं। 6. वे उदास या निराश होने पर भी अच्छाई का पक्ष देखते हैं। सकारात्मक पक्ष देखते हैं। 7. वे अपने बारे में कम ही बात करते हैं। 8. वे आपसे उनके बारे में भी पूछते हैं, जो व्यक्ति आपके लिए मायने रखते हों। 9. वे सकारात्मक व्यवहार दरशाते हैं। 10. वे ईश्वर के अस्तित्व को सर्वोपरि मानते हैं। ‘जो कहते हैं, वह करते हैं’ की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए क्या आप नहीं सोचते कि ‘दर्द-मुक्त कार्यक्रम’ की शुरुआत जीवन में हो जानी चाहिए? उपर्युक्त दस सूत्रीय कार्यक्रम के नुस्खे को अपनाएँ और एक सप्ताह में अच्छे परिणाम पाएँ। दर्द हितकारी, कैसे? —डॉ. नेपोलियन हिल मेरे जीवन का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति अर्थात् मेरी विमाता का जीवन संधिशोथ के दर्दनाक साए में गुजरा। असहनीय वेदना सही उन्होंने; फिर भी जीने की अदम्य इच्छा और आत्मशक्ति ने अगणित लोगों को उत्साहवर्धक जीवन जीने को प्रेरित किया और करती रहेंगी, जिनमें से अभी तो अरबों अजनमे हैं। बाल्यावस्था में उन्होंने ही मुझे व्यावहारिक जीवन के लिए प्रशिक्षित किया। शायद उसी प्रशिक्षण ने मुझे जीवन में ऐसे मुकाम पर पहुँचाया, जहाँ एंड्रयू कार्नेगी जैसे विख्यात व्यक्ति ने मुझे दुनिया को निजी उपलब्धियों को पाने के सूत्र बताने व सिखाने के सिद्धांत सिखाने का जिम्मा दिया। यदि मेरी विमाता व्हीलचेयर (पहिएदार कुरसी) तक सीमित या बँधी नहीं होतीं तो विश्व में कोई नहीं जान पाता कि वे शारीरिक वेदना से ग्रस्त थीं। उनकी आवाज मनमोहक थी और उनकी बातचीत में सकारात्मक विचारों का एक प्रवाह रहता था। उन्होंने कभी शिकायत नहीं कि और हम सभी को, जो उनके नजदीक रहते थे, हमेशा प्रोत्साहक बातों से उत्साह भरती थीं। मुझे विश्वास है कि मेरी माता को जिन्होंने जाना, वे निश्चित ही समझे होंगे कि किस हद तक उन्होंने शारीरिक वेदनाओं को झेला होगा और सहा होगा कि दाँत दर्द या शल्य-चिकित्सा के नाम पर डरनेवालों को शर्मिंदा किया होगा।

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