Home हीन्दी कहानीयां

बूढ़े अपने कपूतों के डर से अपना धन उन्हें सौंप देते।

195
0

बूढ़े अपने कपूतों के डर से अपना धन उन्हें सौंप देते।

मुंशी रामसेवक भौंहे चढ़ाए हुए घर से निकले और बोले – इस जीने से तो मरना भला है। मृत्यु को प्राय: इस तरह के जितने निमंत्रण दिए जाते है, यदि वह सबको स्वीकार करती तो आज सारा संसार उजाड़ दिखाई देता। मुंशी रामसेवक चाँदपुर गाँव के एक बड़े रईस थे। रईसों के सभी गुण इनमें भरपूर थे। मानव चरित्र की दुर्बलताएँ उनके जीवन का आधार थी। वह नित्य मुंसिफी कचहरी के हाते में एक नीम के पेड़ के नीचे कागजों का बस्ता खोले एक टूटी-सी चौकी पर बैठे दिखाई देते थे। किसी ने कभी उन्हें किसी इजलास पर कानूनी बहस या मुकदमे की पैरवी करते नहीं देखा। परंतु उन्हें सब लोग मुख्तार साहब कह कर पुकारते थे। चाहे तूफान आए, पानी बरसे, ओले गिरें, पर मुख्तार साहब वहाँ से टस से मस न होते। जब वह कचहरी चलते तो देहातियों के झुंड के झुंड उनके साथे हो लेते। चारों ओर से उन पर विश्वास और आदर की दृष्टि पड़ती। सब में प्रसिद्ध था ति उनकी जीभ पर सरस्वती विराजती है। इसे वकालत कहो, यह मुख्तारी, परंतु यह केवल कुल-मर्यादा की प्रतिष्ठा का पालन था। आमदनी अधिक न होती थी। चाँदी के सिक्कों की तो चर्चा ही क्या; कभी-कभी ताँबे के सिक्के भी निर्भय उनके पास आने में हिचकते थे। मुंशी जी की कानूनदानी में कोई संदेह न था। परंतु पास के बखेड़े ने उन्हें विवश कर दिया था। खैर जो हो, उनका यह पेशा केवल प्रतिष्ठा-पालन के निमित्त थी। नहीं तो उनके निर्वाह का मुख्य साधन आस-पास की अनाथ पर खाने-पीने में सुखी विधवाओं और भोले-भाले किंतु धनी वृद्धों की श्रद्धा थी। विधवाएँ अपना रुपया उनके यहाँ अमानत रखतीं। बूढ़े अपने कपूतों के डर से अपना धन उन्हें सौंप देते। पर रुपया एक बार मुट्ठी में जा कर फिर निकलना भूल जाता था। वह जरूरत पड़ने पर कभी-कभी कर्ज ले लेते थे। भला, बिना कर्ज लिये किसी का काम चल सकता है? भोर को साँझ के करार पर रुपया लेते, पर साँझ कभी नहीं आती थी। सारांश, मुंशी जी कर्ज ले कर देना सीखे नहीं थे। यह उनकी कुल प्रथा थी। यही सब मामले बहुधा मुंशी जी के सुख-चैन में विघ्न डालते थे। कानून और अदालत का तो उन्हें कोई डर न था। इस मैदान में उनका सामना करना पानी में मगर से लड़ना था। परंतु जब कोई दुष्ट भिड़ जाता, उनकी ईमानदारी पर संदेह करता और उनके मुँह पर बुरा-भला करने पर उतारू हो जाता, तो मुंशी जी के हृदय पर बड़ी चोट लगती। इस प्रकार की दुर्घटनाएँ प्राय: होती रहती थीं। हर जगह ऐसे ओछे रहते है, जिन्हें दूसरों को नीचा दिखाने में ही आनंद आता है। ऐसे ही लोगों का सहारा पा कर कभी-कभी छोटे आदमी मुंशी जी के मुँह लग जाते थे। नहीं तो, कुंजड़िन की इतनी मजाल नहीं थी कि उनके आँगन में जा कर उन्हें बुरा-भला कहे। मुंशी जी उसके पुराने गाहक थे, बरसों तक उससे साग-भाजी ली थी। यदि दाम न दिया तो कुंजड़िन को संतोष करना चाहिए था। दाम जल्दी या देर से मिल ही जाता। परंतु वह मुँहफट कुंजड़िन दो ही बरसों में घबरा गई, और उसने कुछ आने-पैसों के लिए एक प्रतिष्ठित आदमी का पानी उतार लिया। झुँझला कर मुंशी जी अपने को मृत्यु का कलेवा बनाने पर उतारू हो गए तो उनका कुछ दोष न था। 2 इसी गाँव में मूँगा नाम की एक विधवा ब्राह्मणी रहती थी। उसका पति बर्मा की काली पलटन में हवलदार था और लड़ाई में वहीं मारा गया। सरकार की ओर से उसके अच्छे कामों के बदले मूँगा को पाँच सौ रुपए मिले थे। विधवा स्त्री, जमाना नाजुक था, बेचारी ने ये सब रुपए मुंशी रामसेवक को सौंप दिए, और महीने-महीने थोड़ा-थोड़ा उसमें से माँग कर अपना निर्वाह करती रही। मुंशी जी ने यह कर्तव्य कई वर्ष तक तो बड़ी ईमानदारी के साथ पूरा किया। पर जब बूढ़ी होने पर मूँगा नहीं मरी और मुंशी जी को यह चिंता हुई कि शायद उसमें से आधी रकम भी स्वर्ग-यात्रा के लिए नहीं छोड़ना चाहती, तो एक दिन उन्होंने कहा – मूँगा! तुम्हें मरना है या नहीं! साफ-साफ कह दो कि मैं ही अपने मरने की फिक्र करूँ। उस दिन मूँगा की आँखें खुली, उसकी नींद टूटी, बोली – मेरा हिसाब कर दो। हिसाब का चिट्ठा तैयार था। अमानत में अब एक कौड़ी बाकी न थी। मूँगा ने बड़ी कड़ाई से मुंशी जी का हाथ पकड़ लिया और कहा – अभी मेरे ढाई सौ रुपए तुमने दबा रखे है। मैं एक कौड़ी भी न छोडूँगी। परंतु अनाथों का क्रोध पटाखे की आवाज है, जिससे बच्चे डर जाते है और असर कुछ नहीं होता। अदालत में उसका कुछ जोर न था। न लिखा-पढ़ी थी, न हिसाब-किताब। हाँ, पंचायत से कुछ आसरा था। पंचायत बैठी। कई गाँव के लोग इकट्ठे हुए। मुंशी जी नीयत और मामले के साफ थे! सभा में खड़े होकर पंचों से कहा – भाइयों! आप सब लोग सत्यपरायण और कुलीन है। मैं आप सब साहबों का दास हूँ। आप सब साहबों की उदारता और कृपा से, दया और प्रेम से, मेरा रोम-रोम कृतज्ञ है। क्या आप लोग सोचते है कि मैं इस अनाथिनी और विधवा स्त्री के रुपए हड़प कर गया हूँ? पंचों ने एक स्वर में कहा – नहीं, नहीं! आपसे ऐसा नहीं हो सकता। रामसेवक – यदि आप सब सज्जनों का विचार हो कि मैंने रुपए दबा लिये, तो मेरे लिए डूब मरने के सिवा और कोई उपाय नहीं। मैं धनाढ्य नहीं हूँ, न मुझे उदार होने का घमंड़ है। पर अपनी कलम की कृपा से, आप लोगों की कृपा से किसी की मुहताज नहीं हूँ। क्या मैं ऐसा ओछा हो जाऊँगा कि एक अनाथिनी के रुपए पचा लूँ? पंचों ने एक स्वर से फिर कहा – नहीं-नहीं, आप से ऐसा नहीं हो सकता। मुँह से देखकर टीका काढ़ा जाता है। पंचों ने मुंशी जी को छोड़ दिया। पंचायत उठ गई। मूँगा ने आह भर कर संतोष किया और मन में कहा – अच्छा! यहाँ न मिला तो सही, वहाँ कहाँ जाएगा। 3 अब कोई मूँगा का दु:ख सुननेवाला और सहायक न था। दरिद्रता से जो कुछ दु:ख भोगने पड़ते है, वह उसे झेलने पड़े। वह शरीर से पुष्ट थी, चाहती तो परिश्रम कर सकती थी। पर जिस दिन पंचायत पूरी हुई उसी दिन से उसने काम करने की कसम खा ली। अब उसे रात-दिन रुपए की रट लगी रहती। उठते-बैठते, सोते-जागते उसे केवल एक काम था, और वह मुंशी रामसेवक का भला मनाना। झोपड़े के दरवाजे पर बैठी हुई रात-दिन, उन्हें सच्चे मन से असीसा करती। बहुधा अपनी असीम के वाक्यों में ऐसे कविता के भाव और उपमाओं का व्यवहार करती कि लोग सुन कर अचंभे में आ जाते। धीरे-धीरे मूँगा पगली हो चली। नंगे सिर, नंगे शरीर, हाथ में एक कुल्हारी लिये हुए सुनसान स्थानों में जा बैठती। झोपड़े के बदले अब वह मरघट पर नदी के किनारे खंडहरों में घूमती दिखाई देती। बिखरी हुई लटें, लाल-लाल आँखें, पागलों-सा चेहरा, सूखे हुए हाथ-पाँव। उसका यह स्वरूप देखकर लोग डर जाते थे। अब कोई उसे हँसी में भी नहीं छेड़ता। यदि वह कभी गाँव में निकल जाते तो स्त्रियाँ घरों के किवाड़ बंद कर लेती। पुरुष कतरा कर इधर-उधर से निकल जाते और बच्चे चीख मारकर भागते। यदि कोई लड़का भागता न था तो वह मुंशी रामसेवक का सुपुत्र रामगुलाम था। बाप में जो कुछ कोर कसर रह गई थी, वह बेटे से पूरी हो गई थी। लड़कों का उसके मारे नाक में दम था। गाँव के काने औऱ लँगड़े आदमी उसकी सूरत से चिढ़ते थे। और गालियाँ खाने में तो शायद ससुराल में आनेवाले दामाद को भी इतना आनंद न आता था। वह मूँगा के पीछे तालियाँ बजाता, कुत्तों को साथ लिए हुए उस समय ततक रहता जब तक वह बेचारी तंग आकर गाँव से निकल न जाती। रुपया-पैसा, होश-हवाश खोकर पगली की पदवी मिली। और अब बस सचमुच पगली थी। अकेली बैठी अपने आप घंटों बातें किया करती जिसमें रामसेवक के मांस, हड्डी, चमड़े, आँखें, कलेजा आदि को खाने, मसलने, नोचने-खसोटने की बड़ी उत्कट इच्छा प्रकट की जाती थी और जब उसकी यह इच्छा सीमा तक पहुँच जाती तो वह रामसेवक के घर की ओर मुँह करके खूब चिल्लाकर और डरावने शब्दों में हाँक लगाती – तेरा लहू पीऊँगी। प्राय: रात के सन्नाटे में यह गरजती हुई आवाज सुनकर स्त्रियाँ चौंक पड़ती थीं। परंतु इस आवाज से भयानक उसका ठठाकर हँसना था। मुंशी जी के लहू पीने की कल्पित खुशी से वह जोर से हँसा करती थी। इस ठठाने से ऐसी आसुरिक उद्दंडता, ऐसी पाश्विक उग्रता टपकती थी कि रात को सुनकर लोगों का खून ठंड़ा हो जाता था। मालूम होता, मानों सैकड़ो उल्लू एक साथ हँस रहे हैं। मुंशी रामसेवक बड़े हौसले औऱ कलेजे के आदमी थे। न उन्हें दीवानी का डर था, न फौजदारी का, परंतु मूँगा के इन डरावने शब्दों को सुन वह भी सहम जाते। हमें मनुष्य के न्याय का डर न हो, परंतु ईश्वर के न्याय का डर प्रत्येक मनुष्य के मन में स्वभाव से रहता है। मूँगा का भयानक रात का घूमना रामसेवक के मन में कभी-कभी ऐसी ही भावना उत्पन्न कर देता – उनसे अधिक उनकी स्त्री के मन में। उनकी स्त्री बड़ी चतुर थी। वह इनको इन सब बातों में प्राय: सलाह दिया करती थी। उन लोगों की भूल थी, जो लोग कहते थे कि मुंशी जी की जीभ पर सरस्वती विराजती है। वह गुण तो उनकी स्त्री को प्राप्त था। बोलने में वह इतनी तेज थी जितना मुंशी लिखने में थे। और यह दोनों स्त्री पुरुष प्राय: अपनी अवश दशा में सलाह करते कि अब क्या करना चाहिए। आधी रात का समय था। मुंशी जी नित्य नियम के अनुसार अपनी चिंता दूर करने के लिए शराब के दो-चार घूँट पी कर सो गए थे। यकायक मूँगा ने उनके दरवाजे पर आकर जोर से हाँक लगाई, तेरा लहूँ पीऊँगी और खूब खिल-खिलाकर हँसी। मुंशी जी यह भयानक ठहाका सुनकर चौंक पड़ें। डर के मारे पैर थर-थर काँपने लगे। कलेजा धक-धक करने लगा। दिल पर बहुत जोर डालकर उन्होंने दरवाजा खोला, जाकर नागिन को जगाया। नागिन ने झुँझलाकर कहा – क्या कहते हो? मुंशी ने दबी आवाज से कहा – वह दरवाजे पर आकर खड़ी है। नागिन उठ बैठी – क्या कहती है? ‘तुम्हारा सिर।’ ‘क्या दरवाजे पर आ गई?’ ‘हाँ, आवाज नहीं सुनती हो।’ नागिन मूँगा से तो नहीं, परंतु उसके ध्यान से बहुत डरती थी, तो भी उसे विश्वास था कि मैं बोलने में उसे जरूर नीचा दिखा सकती हूँ। सँभलकर बोली – कहो तो मैं उससे दो-दो बातें कर लूँ। परंतु मुंशी जी ने मना किया। दोनों आदमी पैर दबाए हुए ड्योढ़ी में गए और दरवाजे से झाँककर देखा, मूँगा की धुँधली मूरत धरती पर पड़ी थी और उसकी साँस तेजी से चलती हुई सुनाई देती थी। रामसेवक के लहू और मांस की भूख से वह अपना लहू और मांस सूखा चुकी थी। एक बच्चा भी उसे गिरा सकता था; परंतु उससे सारा गाँव थर-थर काँपता। हम जीते मनुष्य से नहीं डरते, पर मुरदे से डरते है। रात गुजरी। दरवाजा बंद था; पर मुंशी जी और नागिन ने बैठकर रात काटी। मूँगा भीतर नहीं घुस सकती थी, पर उसकी आवाज को कौन रोक सकता था। मूँगा से अधिक डरावनी उसकी आवाज थी। भोर को मुंशी जी बाहर निकले और मूँगा से बोले – यहाँ क्यों पड़ी है। मूँगा बोली – तेरा लहू पीऊँगी। नागिन ने बल खाकर कहा – तेरा मुँह झुलस दूँगी। पर नागिन के विष ने मूँगा पर कुछ असर न किया। उसने जोर से ठहाका लगाया, नागिन खिसियानी-सी हो गई। हँसी के सामने मुँह बंद हो जाता है। मुंशी जी फिर बोले – यहाँ से उठ जा। ‘न उठूँगी।’ ‘कब तक पड़ी रहेगी?’ ‘तेरा लहू पीकर जाऊँगी।’ मुंशी जी की प्रखर लेखनी का यहाँ कुछ जोर न चला और नागिन की आग भरी बातें सर्द हो गई। दोनों घर में जाकर सलाह करने लगे, यह बला कैसे टलेगी। इस आपत्ति से कैसे छुटकारा होगा। देवी आती है तो बकरे का खून पीकर चली जाती है; पर यह डाइन मनुष्य का खून पीने आई है। वह खून, जिसकी अगर एक बूँद भी कलम बनाने के समय निकल पड़ती थी, तो अठवारों और महीनों सारे कुनबे को अफसोस रहता, और यह घटना गाँव के घर-घर फैल जाती थी। क्या यही लहू पीकर मूँगा का सूखा शरीर हरा हो जाएगा। गाँव में यह चर्चा फैल गई, मूँगा मुंशी जी के दरवाजे पर धरना दिये बैठी है। मुंशी जी के अपमान में गाँववालों को बड़ा मजा आता था। देखते-देखते सैकड़ों आदमियों की भीड़ लग गई। इस दरवाजे पर कभी-कभी भीड़ लगी रहती थी। यह भीड रामगुलाम को पसंद न थी। मूँगा पर उसे ऐसा क्रोध आ रहा था कि यदि उसका बस चलता तो वह उसे कुएँ में ढकेल देता। इस तरह का विचार उठते ही रामगुलाम के मन में एक गुदगुदी समा गई, और वह बड़ी कठिनता से अपनी हँसी रोक सका! अहा! वह कुएँ में गिरती तो क्या मजे की बात होती। परंतु यह चुडैल यहाँ से टलती ही नहीं, क्या करूँ? मुंशी जी के घर में एक गाय थी, जिसे खली, दाना और भूसा तो खूब खिलाया जाता; पर वह सब उसकी हड्डियों में मिल जाता, उसका ढाँचा पुष्ट होता जाता था। रामगुलाम ने उसी गाय का गोबर एक हाँड़ी मे घोला और सब का सब बेचारी मुँगा पर उँडेल दिया। उसके थोड़े बहुत छींटे दर्शकों पर भी डाल दिए। बेचारी मूँगा लदफद हो गई और लोग भाग खड़े हुए। कहने लगे, यह मुंशी रामगुलाम का दरवाजा है। यहाँ इसी प्रकार का शिष्टाचार किया जाता है। जल्द भाग चलो। नहीं तो अबके इससे भी बढ़कर खातिर की जाएगी। इधर भीड़ कम हुई, उधर रामगुलाम घर में जाकर खूब हँसा और तालियाँ बजाई। मुंशी जी ने इस व्यर्थ की भीड़ को ऐसे सहज और ऐसे सुंदर रूप से हटा देने के उपाय पर अपने सुशील लड़के की पीठ ठोंकी। सब लोग तो चंपत हो गए, पर बेचारी मूँगा ज्यों की त्यों बैठी रह गई। दोपहर हुई। मूँगा ने कुछ नहीं खाया। साँझ हुई। हजार कहने-सुनने से भी उसने खाना नहीं खाया। गाँव के चौधरी ने बड़ी खुशामद की। यहाँ तक की मुंशी जी ने हाथ तक जोड़े, पर देवी प्रसन्न न हुई। निदान मुंशी जी उठकर भीतर चले गए। वह कहते थे कि रूठने वाले को भूख आप ही मना लिया करती है। मूँगा ने यह रात भी बिना दाना-पानी के काट दी। लाला जी और ललाइन ने आज फिर जाग-जागकर भोर किया। आज मूँगा की गरज और हँसी बहुत कम सुनाई पड़ती थी। घरवालों ने समझा, बला टली। सबेरा होते ही जो दरवाजा खोलकर देखा तो वह अचेत पड़ी थी, मुँह पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी और उसके प्राणपखेरू उड़ चुके थे। वह इस दरवाजे पर मरने ही आई थी। जिसने उसके जीवन की जमा-पूँजी हर ली थी, उसी को अपनी जान भी सौंप दी थी। अपने शरीर की मिट्टी तक उसकी भेंट कर दी। धन से मनुष्य को कितना प्रेम होता है। धन अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा होता है। विशेषकर बुढ़ापे में। ऋण चुकाने के दिन ज्यों-ज्यों पास आते-जाते है, त्यों-त्यों उसका ब्याज बढ़ता जाता है। यह कहना यहाँ व्यर्थ है कि गाँव में इस घटना से कैसी हलचल मची और मुंशी रामसेवक कैसे अपमानित हुए! एक छोटे-से गाँव में ऐसी असाधारण घटना होने पर कितनी हलचल हो सकती उससे अधिक हुई। मुंशी जी की अपमान जितना होना चाहिए था, उससे बाल बराबर भी कम न हुआ। उनका बचा-खुचा पानी भी इस घटना से चला गया। अब गाँव का चमार भी उनके हाथ का पानी पीने या उन्हें छूने का रवादार न था। यदि किसी के घर में कोई गाय खूँटे पर मर जाती है तो वह आदमी महीनों द्वार-द्वार भीख माँगता फिरता है। न नाई उसकी हजामत बनावे, न कहार उसका पानी भरे, न कोई उसे छुए। यह गोहत्या का प्रायश्चित! ब्रह्महत्या का दंड तो इससे भी कड़ा है और इसमें अपमान भी बहुत है। मूँगा यह जानती थी और इसीलिए इस दरवाजे पर आकर मरी थी। वह जानती थी कि मैं जीते जी जो कुछ नहीं कर सकती, मर कर उससे बहुत कुछ कर सकती हूँ। गोबर का उपला जल कर खाक हो जाता है, तब साधु-संत उसे माथे पर चढ़ाते है। पत्थर का ढेला आग में जल कर आग से अधिक तीखा और मारक हो जाता है। 4 मुंशी रामसेवक कानूनदाँ थे। कानून ने उन पर कोई दोष नहीं लगाया था। मूँगा किसी कानूनी दफा के अनुसार नहीं मरी थी। ताजीरात हिंद में उसका कोई उदाहरण नहीं मिलता था। इसलिए जो लोग उनसे प्रायश्चित करवाना चाहते थे, उनकी भारी भूल थी। कुछ हर्ज नहीं, कहार पानी न भरे, वह आप पानी भर लेंगे। अपना काम आप करने में भला लाज ही क्या? बजा से नाई बाल न बनावेगा। हजामत बनाने का काम ही क्या है? दाढ़ी बहुत सुंदर वस्तु है। दाढ़ी मर्द की शोभा और सिंगार है। और जो फिर बालों से घिन होगी तो एक-एक आने में तो अस्तुरे मिलते है। धोबी कपड़ा न धोवेगा, इसकी भी कुछ परवाह नहीं। साबुन तो गली-गली कौड़ियों के मोल आता है। एक बट्टी साबुन में दर्जनों कपड़े ऐसे साफ हो जाते है जैसे बगुले के पर। धोबी क्या खाकर ऐसा साफ कपड़ा धोवेगा? पत्थर पर पटक-पटक कर कपड़ों का लत्ता निकाल लेता है। आप पहने, दूसरे को भाड़े पर पहनावे, भट्टी में चढ़ावे; रेह में भिगावे – कपड़ों की तो दुर्गत कर डालता है। जभी तो कुरते दो-तीन साल से अधिक नहीं चलते। नहीं तो दादा हर पाँचवे बरस दो अचकन और दो कुरते बनवाया करते थे। मुंशी रामसेवक और उनकी स्त्री ने दिन भर तो यों ही कहकर मन को समझाया। साँझ होते ही उनकी तर्कनाएँ शिथिल हो गई। अब उनके मन पर भय ने चढ़ाई की। जैसे-जैसे रात बीतती थी, भय भी बढ़ता जाता था। बाहर का दरवाजा भूल से खुला रह गया था, पर किसी की हिम्मत न पड़ती थी कि जाकर बंद तो कर आए। निदान नागिन ने हाथ में दीया लिया, मुंशी जी ने कुल्हाड़ा, रामगुलाम ने गँड़ासा, इस ढंग से तीनों चौंकते-हिचकते दरवाजे पर आए। यहाँ मुंशी जी ने बड़ी बहादुरी से काम लिया। उन्होंने निधड़क दरवाजे से बाहर निकलने की कोशिश की। काँपते हुए, पर ऊँची आवाज में नागिन से बोले – तुम व्यर्थ डरती हो, वह क्या यहाँ बैठी है? पर उनकी प्यारी नागिन ने उन्हें अंदर खींच लिया और झुँझलाकर बोली – तुम्हारा यही लड़कपन तो अच्छा नहीं। यह दंगल जीतकर तीनों आदमी रसोई के कमरे में आए और खाना पकने लगा। परंतु मूँगा उनकी आँखों में घुसी हुई थी। अपनी परछाई को देखकर मूँगा का भय होता था। अँधेरे कोनों में बैठी मालूम होती थी। वही हड्डियों का ढाँचा, वही बिखरे बाल, वही पागलपन, वही डरावनी आँखें, मूँगा का नखशिख दिखाई देता था। इस कोठरी में आटे-दाल के कई मटके रखे हुए थे, वहीं कुछ पुराने चिथड़े भी पड़े हुए थे। एक चूहे को भूख ने बेचैन किया (मटकों ने कभी अनाज की सूरत नहीं देखी थी, पर सारे गाँव में मशहूर था कि इस घर के गजब के डाकू है) तो वह उन दानों की खोज में जो मटकों में कभी नहीं गिरे थे रेंगता हुआ इस चिथड़े के नीचे आ निकला। कपड़ों में खनखडाहट हुई। फैले हुए चिथड़े पतली टाँगे बन गई, नागिन देखकर झिझकी और चीख उठी। मुंशी जी बदहवास होकर दरवाजे की ओर लपके, रामगुलाम दौड़कर उनकी टाँगों से लिपट गया। चूहा बाहर निकल आया। उसे देखकर इन लोगों के होश ठिकाने हुए। अब मुंशी जी साहस करके मटके की ओर चले। नागिन ने कहा – रहने भी दो, देख ली तुम्हारी मरदानगी। मुंशी जी अपने प्रिया नागिन के इस अनादर पर बहुत बिगड़े – क्या तुम समझती हो मैं डर गया? भला डर की क्या बात थी। मूँगा मर गई। क्या वह बैठी है? मैं कल नहीं दरवाजे के बाहर निकल गया था – तुम रोकती रही, मैं न माना। मुंशी जी की इस दलील ने नागिन को निरुत्तर कर दिया। कल दरवाजे के बाहर निकल जाना या निकलने की कोशिश करना साधारण काम न था। जिसके साहस का ऐसा प्रमाण मिल चुका है, उसे डरपोक कौन कह सकता है? यह नागिन की हठधर्मी थी। खाना खाकर तीनों आदमी सोने के कमरे में आए; परंतु मूँगा ने यहाँ भी पीछा न छोड़ा; बातें करते थे, दिल को बहलाते थे। नागिन ने राजा हरदौल और रानी सारंधा की कहानियाँ कही। मुंशी जी ने फौजदारी के कई मुकदमों का हाल कह सुनाया। परंतु तो भी इन उपायों से भी मूँगा की मूर्ति उनकी आँखों के सामने से न हटती थी। जरा भी खटखटाहट होती कि तीनों चौंक पड़ते। इधर पत्तियों की सनसनाहट हुई कि उधर तीनों के रोंगटे खड़े हो गए? रह-रहकर एक धीमी आवाज धरती के भीतर से उनके कानों में आती थी – ‘तेरा खून पीऊँगी।’ आधी रात को नागिन नींद से चौंक पड़ी। वह इन दिनों गर्भवती थी। लाल-लाल आँखोंवाली, तेज और नोकीले दाँतोंवाली मूँगा उसकी छाती पर बैठी हुई जान पड़ती थी। नागिन चीख उठी। बावली की तरह आँगन में भाग आई और यकायक धरती पर गिर चित्त गिर पड़ी। सारा शरीर पसीने-पसीने हो गया। मुंशी जी उसकी चीख सुनकर चौंके, पर डर के मारे आँखें न खुलीं। अंधों की तरह दरवाजा। टटोलते रहे। बहुत देर के बाद उन्हें दरवाजा मिला। आँगन में आए। नागिन जमीन पर पड़ी हाथ-पाँव पटक रही थी। उसे उठाकर भीतर लाए, पर रात भर उसने आँखें न खोली। भोर को अक-बक बकने लगी। थोड़ी देर में ज्वर हो आया। बदन लाल तवा-सा हो गया। साँझ होते-होते उसे सन्निपात हो गया और आधी रात के समय जब संसार में सन्नाटा छाया हुआ था नागिन इस संसार से चल बसी। मूँगा के डर ने उसकी जान ली। जब तक मूँगा जीती रही, वह नागिन की फुफकार से सदा डरती रही। पगली होने पर भी उसने कभी नागिन का सामना नहीं किया पर अपनी जान देकर उसने आज नागिन की जान ली। भय में बड़ी शक्ति है। मनुष्य हवा में एक गिरह भी नहीं लगा सकता, पर इसने हवा में एक संसार रच डाला है। रात बीत गई। दिन चढ़ता आता था, पर गाँव को कोई आदमी नागिन की लाश उठाने को आता न दिखाई दिया। मुंशी जी घर-घर घूमे, पर कोई न निकला। भला हत्यारे के दरवाजे पर कौन जाए? हत्यारे की लाश कौन उठावे? इस समय मुंशी जी का रोब-दाब, उनकी प्रबल लेखनी का भय और उनकी कानूनी प्रतिभा एक भी काम न आई। चारों ओर से हार कर मुंशी जी फिर अपने घर आ गए। यहाँ उन्हें अंधकार दीखता था। दरवाजे तक तो आए, पर भीतर पैर नहीं रखा जाता था। न बाहर ही खड़े रह सकते थे। बाहर मूँगा थी, भीतर नागिन। जी को कड़ा करके हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए घर में घुसे। उस समय उनके मन पर जो बीतती थी, वही जानते थे। उसका अनुमान मुश्किल है। घर में लाश पड़ी हुई है; न कोई आगे, न पीछे। दूसरा ब्याह तो हो सकता था। अभी इसी फागुनी में तो पचासवाँ लगा है; पर ऐसे सुयोग्य और मीठी बोलवाली स्त्री कहाँ मिलेगी? अफसोस! अब तगादा करनेवालों से बहस कौन करेगा, कौन उन्हें निरुत्तर करेगा? लेन-देन का हिसाब-किताब कौन इतनी खूबी से करेगा? किसकी बड़ी आवाज तीर की तरह तगादेदारों की छाती में चुभेगी? यह नुकसान अब पूरा नहीं हो सकता। दूसरे दिन मुंशी जी लाश को ठेलेगाड़ी पर लादकर गंगा जी की तरफ चले। 5 शव के साथ जानेवालों की संख्या कुछ भी न थी। एक स्वयं मुंशी जी, दूसरे उनके पुत्ररत्न रामगुलाम थे! इस बेइज्जती से मूँगा की लाश भी नहीं उठी थी। मूँगा ने नागिन की जान लेकर भी मुंशी जी का पिंड न छोड़ा। उनके मन में हर घड़ी मूँगा की मूर्ति विराजमान रहती थी। कहीं रहते, उनका ध्यान इसी ओर रहा करता था। यदि दिल-बहलाव का कोई उपाय होता तो शायद वह इतने बेचैन न होते, पर गाँव का एक पुतला भी उनके दरवाजे की ओर न झाँकता था। बेचारे अपने हाथों पानी भरते, आप ही बरतन धोते। सोच और क्रोध, चिंता और भय, इतने शत्रुओं के सामने एक दिमाग कब तक ठहर सकता था। विशेषकर वह दिमाग जो रोज कानून की बहसों में खर्च हो जाता था। अकेले कैदी की तरह उनके दस-बारह दिन तो ज्यों-त्यों कर कटे। चौदहवें दिन मुंशी जी ने कपड़े बदले और बोरिया-बस्ता लिए हुए कचहरी चले। आज उनका चेहरा कुछ खिला हुआ था। जाते ही मुवक्किल मुझे घेर लेंगे। मेरी मातमपुर्सी करेंगे। मैं आँसुओं को दो-चार बूँदें गिरा दूँगा। फिर बैनामों, रेहननामों और सुलहनामों की भरमार हो जाएगी। मुट्ठी गरम होगी; शाम को जरा नशे-पानी का रंग जम जाएगा, जिसके छूट जाने से जी और भी उचाट रहा था। इन्हीं विचारों में मग्न मुंशी जी कचहरी पहुँचे। पर वहाँ रेहननामों की भरमार और बैनामों की बाढ़ और मुवक्किलों की चहल-पहल के बदले निराशा की रेतीली भूमि नजर आई। बस्ता खोलें घंटों बैठे रहे, पर कोई नजदीक भी न आया। किसी ने इतना भी न पूछा कि आप कैसे है! नए मुवक्किल तो खैर, बड़े-बड़े पुराने मुवक्किल जिनका मुंशी जी से कई पीढ़ियों से सरोकार था, आज उनसे मुँह छिपाने लगे। वह नालायक और अनाड़ी रमजान, जिसकी मुंशी जी हँसी उड़ाते थे और जिसे शुद्ध लिखना भी न आता था, आज गोपियों का कन्हैया बना हुआ था। वाह रे भाग्य? मुवक्किल यों मुँह फेरे चले जाते है मानो किसी की जान-पहचान ही नहीं। दिन भर कचहरी की खाक छाने के बाद मुंशी जी घर चले। निराशा और चिंता में डूबे हुए। ज्यों-ज्यों घर के निकट आते थे, मूँगा का चित्र सामने आता जाता था। यहाँ तक कि जब घर का द्वार खोला और दो कुत्तें, जिन्हें रामगुलाम ने बंद रखा था, झपटकर बाहर निकले तो मुंशी जी के होश उड़ गएष एक चीख मारकर जमीन पर गिर पड़े। मनुष्य के मन और मस्तिष्क पर भय का जितना प्रभाव होता है उतना और किसी शक्ति का नहीं। प्रेम, चिंता, निराशा, हानि, यह सब मन को अवश्य दु:खित करते है, पर यह हवा के हलके झोंके है और भय प्रचंड़ आँधी है। मुंशी जी पर इसके बाद क्या बीती, मालूम नहीं। कई दिनों तक लोगों ने उन्हें कचहरी जाते और वहाँ से मुरझाए हुए लौटते देखा। कचहरी जाना उनका कर्तव्य था, और यद्यपि वहाँ मुवक्किलों का अकाल था, तो भी तगादेदारों से गला छुड़ाने और उनको भरोसा दिखाने के लिए अब यही एक लटका रह गया था। इसके बाद कई महीने तक देख न पड़े। बद्रीनाथ चले गए। एक दिन गाँव में एक साधु आया। भभूत रमाए, लंबी जटाऐं, हाथ में कमंडल। उनका चहेरा मुंशी रामसेवक से बहुत मिलता-जुलता था। बोलचाल में भी अधिक भेद न था। वह एक पेड़ के नीचे धूनी रमाए बैठा रहा। उसी रात को मुंशी रामसेवक के घर से धुआँ उठा, फिर आग की ज्वाला दीखने लगी और आग भड़क उठी। गाँव के सैकड़ों आदमी दौड़े। आग बुझाने के लिए नहीं, तमाशा देखने के लिए। एक गरीब की हाय में कितना प्रभाव है। रामगुलाम मुंशी जी के गायब हो जाने पर अपने मामा के यहाँ चला गया और वहाँ कुछ दिनों रहा। पर वहाँ उसकी चाल-ढाल किसी को पसंद न आई। एक दिन उसने किसी के खेत से मूली नोची। उसने दो-चार धौल लगाए। उस पर वह इस कदर बिगड़ा कि जब उसके चने खलिहान में आए तो उसने आग लगा थी। सारा का सारा खलिहान जलकर खाक हो गया। हजारों रुपयों का नुकसान हुआ। पुलिस ने तहकीकाक की, रामगुलाम पकड़ा गया। इसी अपराध में वह चुनार के रिफार्मेटरी स्कूल में मौजूद है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here