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मुल्क के रक्षा के लिए 5 टन सोना देने वाला

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मुल्क के रक्षा के लिए 5 टन सोना देने वाला

मुल्क के रक्षा के लिए 5 टन सोना देने वाला इस मुल्क की सरहदों को कोई छू भी नहीं सकता। जिस मुल्क के लोग उसे मुसीबत में देखकर अपना सब कुछ दाव पर लगाने के लिए तैयार हो। यह बात उस दौर की याद दिलाती है। जब हिंद के सरज़मीन पर विदेशी का खतरा बढ़ गया था ‌।

और प्रधानमंत्री के कहने पर एक निजाम ने अपना पूरा खजाना देश की रक्षा के लिए खोल दिया था। उस महान दानी का नाम था, मीर उस्मान अली, जो 1965 में हैदराबाद के निजाम थे। पैसे के मामले में भारत के सेना के लिए इतना बड़ा दान शायद ही किसी ने दिया होगा। तो चलिए जानते हैं उस किस्से को जिसने मीर उस्मान अली को मोहसीने हिंदुस्तान बना दिया।

मीर उस्मान अली हैदराबाद के रियासत के अंतिम निजाम थे। वह विश्व के सबसे धनी व्यक्ति में शामिल थे। उस समय उसकी कुल संपत्ति अमेरिका के कुल अर्थव्यवस्था का 2 दो परतीसत थी। इसीलिए टाइम मैगज़ीन ने 1937 में उसकी फोटो 1937 में उसकी फोटो अपनी मैगज़ीन के कवर पेज पर लगाई।

हैदराबाद के निजाम के संपत्ति का इसी बात से आकलन लगाया जा सकता है कि वो 5 करोड़ पाउंड वाले शुतुरमुर्ग के अंडे के आकार के जितना बड़े हीरे को पेपरवेट के तौर पर इस्तेमाल किया करते थे।

वही इसपैलेस में करीब 6000 लोग काम किया करते थे। जिसमें 38 लोग केवल मोमबत्ती स्टैंड के धुल ही साफ किया करते थे। इतना सब होने के बाद भी उस्मान अली बेहद साधारण किस्म की जीवन गुजारते थे। कहा तो यह जाता है कि उसने अपनी पूरी जिंदगी एक ही टोपी पहनकर और एक ही कंबल ओढ़ कर गुजार दीं।

वही उसके दरियादिली साधारण जीवन से उपर थी। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय के लिए। आरथीक मदद मांगने के तुरंत बाद बिना किसी देरी किए ₹100000 रुपए का दान दिया।

1965 में भारत पाकिस्तान से युद्ध जीत चुका था। और पूरे देश में जश्न का माहौल था। भारतीय इस जीत का जश्न अभी ठीक से मना भी नहीं पाए थे। के उसके सामने दूसरा खतरा चीन के रुप में खड़ा हो गया।

तिब्बत को आजाद कराने के लिए चीन ने भारत को दादागिरी दिखाने शुरू कर दी। और युद्ध तक की धमकी दे डाली। ऐसे में भारत इस बात से चिंतित हो उठा। भारत कुछ दिन पहले ही एक भयानक युद्ध से गुजरा था। हालांकि युद्ध में हमारी जीत हुई थी। लेकिन फिर एक और युद्ध उस पर थोपा जाना कहीं से भी उचित नहीं था।

उधर चीन का सेना पूरी तरह से युद्ध के लिए तैयार थी। यहां सैनीकों के हाथ खाली थे।वही देश विभाजन के दुख झेल रहे थे। और पाकिस्तान से युद्ध के चलते भारत के पास धन की कमी भी थी।

ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सेना की मदद के लिए। भारतीय रक्षा कोष की स्थापना की। शास्त्री जी ने लोगों से सेना के लिए दान की अपील की। इस अपील ने भावना से लोगों को ओधक्रोध कर दिया। और वह देश सेवा के लिए टूट पड़े। आम नागरिक उससे जितना भी हो सकता था पूरा करने में जुट गए। जिसके पास पैसा नहीं था।वह कपड़े और भोजन दान कर रहा था।

यहां तक कि लोग रक्तदान करने के लिए उम्र पड़े ताकी सैनिकों के इलाज में मदद मिल सके। लेकिन उस समय यह सब युद्ध के लिए काफी नहीं था। उस समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने रेडियो द्वारा लोगों राज राज्यबाड़यों से,
देश के लिए मदद मांगी। शास्त्री जी के आवाहन को हैदराबाद में बैठे निजाम भी सुन रहे थे। लिहाजा उन्होंने इस मामले में मदद का मन बनाया।

और शास्त्री जी को दिल्ली से हैदराबाद आने का निमंत्रण भेज दिया। क्योंकि सेना को तत्काल सहायता की जरूरत थी। इसीलिए निमंत्रण मिलते हैं लाल बहादुर शास्त्री ने बिना किसी देर कीए हैदराबाद पहुंच गए।

निजाम अली उस्मान ने उनका बेगम एयरपोर्ट पर है इस्तकबाल किया। शास्त्री जी जानते थे कि उन्हें हैदराबाद में निराशा नहीं मिलेगी। इसीलिए प्रधानमंत्री ने जल्द ही निजाम से बात की और स्थिति से अवगत कराया। लेकिन उसमान आली इसके लिए पहले ही तैयार थे।

बिना 1 सेकंड सोचे मीर उस्मान अली ने अपना खजाना भारत के रक्षा के लिए खोल दिया। और भारतीय रक्षा कोष के लिए 5 टन सोना देने का ऐलान कर दिया। उस्मान अली ने लोहे के बक्से एयरपोर्ट पर मंगवाए।

पहले एक फिर दो और फिर देखते ही देखते कई बक्से पीएम के सामने रख दिए गए। मीर उस्मान अली मुस्कुराए और कहने लगे मै यह 5 टन सोना भारत के रक्षा के लिए दान कर रहा हूं ।
इसे स्वीकार करें और निडर होकर जंग लड़े। हम जरूर जीतेंगे।

इस तरह से शास्त्री जी 5 टन सोने से भड़े बक्सा को लेकर दिल्ली रवाना हो गए। इस घटना की जानकारी मीडिया तक पहुंचे और यह खबर पूरे देश में अखबार और रेडियो के माध्यम से फैल गई।

हर किसी ने मेरे उस्मान की दरियादिली की तारीफ की यहां तक कि विदेशी मीडिया ने भी इस घटना को कवर किया। 1 साल गुजर गया अब देश में हालात पहले से बेहतर थे।

हलाकि मीर उस्मान अली के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। वह वापस अपने पैलेस में वही साधारण जीवन जीने लगे।

लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री ने अपनी किताब लाल बहादुर शास्त्री में जिक्र किया है।की उस्मान अली की तबीयत खराब होने लगी तो लाल बहादुर शास्त्री ने उसे फोन कर उनकी हालचाल पूछा।

इतने में नीजाम ने अपने बौक्से की बात छेड़ दी।
शास्त्री जी मैंने जिस बौक्से में आपको सोना दिया था।यदि आपने सोना खाली कर लिया हो तो वह बक्सा मुझे लौटा दें।

यह सुनकर शास्त्री जी हंस पड़े और बोले। मैं उन्हें आप तक जरूर पहुंचा दूंगा। इस तरह भारत सरकार ने उसके पुश्तैनी लोहे के बक्से को बड़े प्यार से लौटा दिए।

ये इतिहासिक दान देने के कुछ साल के बाद मीर उस्मान अली का देहांत हो गया। सदा के लिए इस धरती से विदा हो गए। हैदराबाद के निजाम द्वारा किया गया। यह इतिहासिक सहयोग भारत के इतिहास में खास है। इस सोने की वर्तमान कीमत लगभग 65 सौ करोड़ बैठती है। ऐसा माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इतनी बड़ी सहायता किसी भी संगठन व्यक्ति द्वारा एकमुश्त नहीं किया गया।

आप इस दिलचस्प कहानी के बारे में क्या सोचते हैं।

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