वह बहुत सुशील तथा सुन्दर थी

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वह बहुत सुशील तथा सुन्दर थी

वह बहुत सुशील तथा सुन्दर थी
प्राचीनकाल में मिथिलावती नामक नगर में अग्निस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम मन्दारवती था। वह बहुत सुशील तथा सुन्दर थी। वह कन्या जब युवती हुई, तब कान्यकुब्ज से तीन ब्राह्मण-पुत्र वहां आए, जो समान भाव से समस्त गुणों से अलंकृत थे। उन तीनों ने ही उसके पिता से, अपने लिए कन्या की याचना की। प्राण देकर भी वे यह नहीं चाहते थे कि वह कन्या, उनमें से किसी दूसरे को दी जाए, किंतु उसके पिता ने उनमें से किसी को भी अपनी कन्या नहीं दी, क्योंकि उसे भय हुआ कि ऐसा करना, दूसरों के वध का कारण बनेगा और इस तरह वह कन्या कुंवारी ही रही। वे तीनों ब्राह्मणकुमार भी चकोर का व्रत लेकर, उसके मुखचन्द्र पर टकटकी लगाए, रात-दिन वहीं रहने लगे। एक बार अचानक मन्दारवती को दाह-ज्वर हुआ और कुंवारी अवस्था में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु हो जाने पर वे तीनों ब्राह्मणकुमार शोक से बड़े विकल हुए और उसे सजा-सँवारकर श्मशान में ले गए, जहाँ उसका दाह-संस्कार हुआ। उनमें से एक ने वहीं एक कुटिया बना ली और उसके चिता-भस्म की शय्या बनाकर, भिक्षा में प्राप्त अन्न पर निर्वाह करता हुआ रहने लगा। दूसरा ब्राह्मणकुमार उसकी अस्थियों को लेकर गंगा-तट पर चला गया और तीसरा साधु होकर देश-देशान्तरों में भ्रमण के लिए निकल पड़ा। वह घूमता-घामता ‘वक्रोलक’ नाम के गाँव में जा पहुँचा। वहां अतिथि के रूप में उसने किसी ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया। ब्राह्मण द्वारा सम्मानित होकर जब वह भोज करने के लिए बैठा, तो उसी समय एक बालक ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया, बहुत समझाने-बुझाने पर भी जब वह बालक चुप नहीं हुआ, तो घर की मालकिन ने क्रोधित होकर उसे उठाया और जलती हुई आग में डाल दिया। आग में डालते ही कोमल शरीर वाला वह बालक जलकर राख हो गया। यह देखकर उस साधु को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कहा- ‘हाय! हाय! धिक्कार है। मैं तो ब्रह्मराक्षस के घर में आ गया हूँ, अतः साक्षात् पाप के समान यहाँ का यह अन्न मैं नहीं खाऊँगा।’ साधु की ऐसी बात सुनकर गृहस्थ बोला- ‘महाराज! मैं मरे हुए को जिला देने वाला एक ऐसा मंत्र जानता हूँ, जो पढ़ते ही सफल होता है। तुम उसका प्रभाव देखो।’ यह कहकर वह गृहस्थ उस पुस्तिका को ले आया, जिसमें वह मंत्र लिखा हुआ था। उस मंत्र को पढ़कर, उससे अभिमंत्रित धूल उसने आग में डाल दी। इससे वह बालक जीवित होकर, ज्यों का त्यों आग से निकल आया। तब उस ब्राह्मण साधु का चित्त शांत हो गया और फिर उसने भोजन समाप्त कर दिया। फिर उस गृहस्थ ने उस पुस्तिका को बाँधकर एक खूँटी पर टाँग दिया और भोजन करके साधु के साथ वहीं सो गया। गृहपति के सो जाने के कुछ ही देर बाद साधु चुपचाप उठा और अपनी प्रिया को जीवित करने की इच्छा से उसने डरते-डरते उस पुस्तिका को खूँटी से उतारा और वहां से चुपचाप खिसक गया। रात-दिन चलता हुआ वह उसी श्मशान में जा पहुँचा, जहाँ उसकी प्रिया का दाह-संस्कार हुआ था। वहां पहुँचते ही उसने उस दूसरे ब्राह्मण को भी देखा, जो मन्दारवती की अस्थियाँ लेकर गंगा में डालने गया था। तब उस साधु ने उससे तथा उस पहले ब्राह्मण से, जिसने वहां झोपड़ी बना ली थी और चिता भस्म की सेज रच रखी थी, कहा कि तुम यह झोपड़ी यहाँ से हुआ लो, जिससे मैं किसी मंत्र द्वारा, इस भस्म में से मंदारवती को जीवित करके उठा लूँ। इस प्रकार, उन्हें बहुत समझा-बुझाकर उसने वह झोपड़ी उजाड़ डाली और पुस्तिका खोल कर मंत्र पढ़ने लगा। उसने धूल को अभिमंत्रित करके चिता-भस्म पर डाल दिया और

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मन्दारवती उसमें से जीती-जागती निकल आई। अग्नि में प्रवेश करके निकले हुए उसके शरीर की कांति पहले से भी अधिक तेज हो गई थी। वह शरीर अब ऐसा जान पड़ता था, मानों सोने का बना हुआ हो। इस प्रकार, उसको जीवित देखकर वे तीनों ही काम-पीड़ित हो गए और उसको पाने की इच्छा से आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। पहला ब्राह्मण बोला- ‘यह मेरी पत्नी है। मैंने इसे अपने मंत्र-बल से पाया है।’ दूसरा बोला- ‘इसके भस्म को रखकर अपनी तपस्या से इसे मैंने जीवित किया है, अतः यह मेरी पत्नी है।’ यह कहानी सुनाकर बेताल बोला – ‘राजन्! अब आप उन तीनों ब्राह्मणकुमारों के इस विवाद का निर्णय करके ठीक-ठीक बताएँ कि उसे किसकी पत्नी होना चाहिए? अगर आपने मेरे इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी नहीं दिया, तो मेरी शर्त के अनुसार आपके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। अब विक्रमादित्य को उत्तर देना ही पड़ा। उन्होंने कहा- ‘बेताल! जिसने कष्ट उठाकर भी, मंत्र-बल से उसे जीवित किया, वह उसका पिता हुआ। ऐसा काम करने के कारण उसे पति नहीं होना चाहिए। जो उसकी अस्थियाँ गंगा में डाल आया, उसे पुत्र समझना चाहिए। किंतु जो उसके भस्म की शय्या पर, उसका आलिंगन

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करते हुए तपस्या करता रहा और श्मशान में ही बना रहा, उसे ही उसका पति कहना चाहिए, क्योंकि गाढ़ी प्रीति वाले उस ब्राह्मणकुमार ने ही पति के समान आचरण किया था।’ अपना मौन तोड़कर राजा विक्रमादित्य ने जैसे ही बेताल के प्रश्न का उत्तर दिया, बेताल को आजाद होने का मौका मिल गया और वह उनके कंधे से शवसहित अदृश्य होकर उसी श्मशान में सिरस के वृक्ष पर जा लटका।

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