Home इतिहास हज़रत सुल्तान मह़मूद गज़नवी और बुढ़िया के वाक़्या

हज़रत सुल्तान मह़मूद गज़नवी और बुढ़िया के वाक़्या

0

हज़रत सुल्तान मह़मूद गज़नवी
और बुढ़िया के वाक़्या

हज़रत सुल्तान मह़मूद गज़नवी
और बुढ़िया के वाक़्या

शाहों में यादगार है महमूद गज़नवी।
अल्लाह अरे वह ज़ोर वह बल सपा खरी।

था उसके डर से राअशाह बर अंदाम ऐसा।
हासिल थी कीसको को एशिया में ऐसी सरवरी।

कहते हैं उस के दौर में एक क़ाफिला लूटा।
कुछ लोग कत्ल भी हुए थे चोर सबजरी।

उस कारबां में एक जवाब भी हुआ शहीद।
एक बूढ़ी मां की लूट गई खेती हरी भरी।

मह़मूद की हुज़ूर में आई वह गम नसीब।
और बोली तेरी मुल्क में कैसी है अबतरीे।

मह़फूज़ जब नहीं है रियाया का जान माल।
किस रोज़ काम आएगी तेरी दिलावरी।

महमूद ने कहा वह खीत्ता यहां से दूर।
क्यों कर हो इतनी दूर भला अदल गुसतरी।

बोली बहुत अदब से यह सुनकर वह पीरज़न।
एक आरजू मैं करूंगी जो हो जाए जां बरी।

क़ब्ज़ा ही तूने दूर के मुल्को पर क्यों किया।
है जबकि तेरे दूर के मुल्कों में अबतरीे।

जो राज़ तेरे बस में न हो शाहज़ी वक़ार!
ह़ासिल है ऐसे राज़ से क्या? सोच तू ज़री।

मह़मूद पर असर हुआ औरत की बात का।
बोला कि अब नहीं होगी कहीं यह सितमगरी।

इस पीरज़न की झोली जवाहिर से पुर करो।
गज़नी की बादशाही पर है इसको बरतरी।