हिंदुस्तान और ईस्ट इंडिया कंपनी के बारे में पूरी जानकारी

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हिंदुस्तान और ईस्ट इंडिया कंपनी के बारे में पूरी जानकारी

हिंदुस्तान और ईस्ट इंडिया कंपनी के बारे में पूरी जानकारीयूरोप के सुमाली मग़रबी हिस्से में एक छोटा सा मुल्क इंग्लिस्तान है ।जिसको अंग्रेजी जुबान में इंग्लैंड कहते हैं ।इंग्लैंड के बाशिंदों को अंग्रेज कहा जाता है । इंग्लिश तान का दारू सल्तनत लंदन है ।जो दुनिया के शहरों में आबादी के लिहाज से बहुत बड़ा शहर है । जब मुस्लिम बादशाहों के जमाने में। हिंदुस्तान की तरक्की और खुशहाली का चर्चा दुनिया में फैला तो यूरोप की बहुत सी कॉमो ने । हिंदुस्तान का रुख किया। अपने भारत की संसद से स्थान का रुख किया। चुनांचे सबसे पहले पुर्तगाल का सौदागर वासाकुडी गामा। अपना तिजारती जहाज लेकर 904 हिजरी मुताबिक़ 1494 ईसवी में हिंदुस्तान पहुंचा फिर 109 हिजरी मुताबिक 1600 ईसवी मे हाईलैंड के। सोदागर आए। और हिंदुस्तान से तिजारत करके उन्होंने ख़ुब दौलत कमाई । जब इन saudagar की कामयाब तिजारत का सोहरा यूरोप में फैला तो। फ्रांस जर्मनी डेनमार्क और इंग्लैंड के ताजिर भी अपने अपने तिजारती जहाज लेकर हिंदुस्तान के साहिल पर उतरे। और साहिली शहरों में मुन्तजिर होकर तिजारत करने लगे। 1017 हिजरी मुताबिक 1608 ईस्वी मे जब के हिंदुस्तान पर। बादशाह नूरुद्दीन जहांगीर की हुकूमत थी। अंग्रेज सौदागरों ने बादशाह जहांगीर से। इजाजत लेकर शहर सूरत में अपनी कोई एक कोठिया तामीर कराई और वहां के दौरे हुकूमत में। जब इनकी शहजादी जहांआरा बीमार पड़ी और बीमारी ने खतरनाक सूरत अख्तियार की तो उन्होंने सूरत से अंग्रेज डॉक्टर बाएटन को तलब किया। वह सूरत से चलकर दरबार में हाजिर हुआ। और शहजादी का इलाज किया। अल्लाह ताला के फजल से शहजादी को सेहत हो हो गई। शाहजहां बहुत खुश हुए। डॉक्टर बाएटन ने। मौका सुनहरा देखा। और कारगरदगी के इनाम में। शाहजहां बादशाह ने। 1048 हिजरी मुताबिक 1637 ईस्वी में। एक शाही फरमान हासिल किया। के अंग्रेज सोबए बंगाल में बिला महसूल दिए। तिजारत कर सकते हैं। इस फरमान शाही की बदौलत। सोबए बंगाल में। अंग्रेजों का अपना तिजारती कारोबार चमकाने का खूब मौका मिला। जिस तिजारती कारोबार में। कई आदमी का साझा हो। उसको तिजारती कंपनी कहते हैं। हिंदुस्तान में अंग्रेज तिजारती कंपनी बनाकर। खरीद फरोख्त का काम करते रहे। 1119 हिजरी मुताबिक 1707 ईसवी तक अंग्रेजों की दो कंपनी अलग-अलग तिजारत करती रही। फिर बाद में उन्होंने अपने आपस में इत्तेफाक करके उन दोनों कंपनियों को। तोड़कर 1120 हिजरी मुताबिक 1708 ईस्वी में। एक कंपनी बना दिया। उसका नाम ईस्ट इंडिया कंपनी रखा। शहंशाहए हिंदुस्तान हजरत औरंगजेब आलमगीर रहमतुल्ला ताला अलैह। के विशाल के बाद। सिर्फ 5 साल गुजरने पाए थे के। मोग़ल हुकूमत में बुरी तरह घुन लग गई। और दिन-ब-दिन कमजोर होती चली गई। यहां तक कि उसका वसी रुकवा कई टुकड़ों में बट गया। और हिंदुस्तान के राज्य गान नेज़ नवाबों ने अपनी खुद मुख्तार अलग-अलग हुकुमत कायम कर ली। या अफरा-तफरी देखकर अंग्रेज साहूकारो को भी हिंदुस्तान में अंग्रेजी सल्तनत कायम करने का हौसला पैदा हुआ। चुनांचे उनकी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी मुलाजमीन और नौकरों को जंगी तालीम दिलवाई। और बहुत से नए सिपाहियों को। कंपनी की फौज में भर्ती किया। इस तरह उन्होंने लड़ने भरने के लिए। एक लाश कर तैयार करके। हिंदुस्तान की सल्तनत में दाखिल देना शुरु कर दिया। 1170 हिजरी मुताबिक 1757 ईसवी में अंग्रेजों ने बंगाल के। नवाब सिराजुद्दौला पर झूठा इल्जाम लगाकर। उसके खिलाफ ऐलान-ए-जंग कर दिया। नवाब सिराजुद्दौला ने। मुकाबला की तैयारी की। जब प्लासी के मैदान में। अंग्रेजी फौज और नवाब के लश्कर का इज्तिमा हुआ तो। अंग्रेजों ने अपनी फौजी ताकत को कमज़ोर समझकर। नवाब के वजीर जाफर को भड़काकर इसको लालच देकर अपना तरफदार बनाया। 6सवाउल मुकर्रम 1170 हिजरी मुताबिक 24 जून 1757 ईसवी को जंग शुरू हुई। लेकिन जाफर के फरेब और मक्कारी के सबब नवाब‌ हार गया। और अंग्रेजो की फतेह हुई। इस फतेह से अंग्रेजों का हौसला बढ़ा। और वह पूरे बंगाल पर सियासी हैसियत से छा गए। 1179 हिजरी मुताबिक 1765 ईस्वी में। अंग्रेजों ने मुगल हुकूमत के बराए नाम बादशाह शाह आलम से इलाहाबाद में। बंगाल बिहार उड़ीसा के एक शाही फरमान हासिल किया। जिससे उन सोबो की। सल्तनत ईस्ट इंडिया कंपनी की हवाला हो गई। अब हिंदुस्तान में अंग्रेजों की भी बाकायदा हुकुमत कायम हो गई। इसके बाद से दिल्ली के मुगल बादशाह सिर्फ नाम के बादशाह होते रहे। अंग्रेजों ने इन्हें पेंशन देकर हुक्मरानी इनसे छीन लिए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकुमत कायम होने के बाद। अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के राज्य गान और नवाबों को आपस में खूब लड़ाया। इस तरह इनका जोर-जोर कर अपना राज वसी करते गए। यहां तक की 1672 हिजरी मुताबिक 1856 ईसवी में। हिंदुस्तान के हुक्मरान बन गए।

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