Allah ki Marzi Kiya hai, Kiya har Nuksan Allah Karta Hai|Imam Ali Says

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अल्लाह की मर्जी क्या है, क्या हर नुकसान अल्लाह करता है,  इमाम अली. In Hindi.

एक शख्स गुस्से में ह़ज़रत इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अपना सर पीट-पीटकर कहने लगा,
या अली कल मुझे बहुत बड़ा नुकसान हो गया, मुझे बताएं, मेरे इस नुकसान से अल्लाह को क्या मिला, क्यों अल्लाह ने मेरा नुकसान किया.
बस यह कहना था तो इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु ने अपने नज़रों को उठाया, और कहा ऐ शख्स किसने कहा कि तुम्हारा नुकसान तुम्हारे खालिक ने किया,
किसी का बुरा करना,
किसी का नुकसान करना,
अल्लाह के कानून में नहीं.
याद रखना जब जब जो इंसान पैदा होता है, अल्लाह उसकी तकदीर में क़ामयाबी और खुशहाली लिख देता है.
लेकिन अफसोस तो यह है कि इंसान खुद अपने गलत फैसलों से अपना नुकसान करता है, और अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचता.
बताओ! इस जमीन पर तुम्हारे नजदीक
सबसे ज्यादा प्यार तुम्हें किस से मिला?
तो वह कहने लगा या अली मुझे प्यार, मोहब्बत, खयाल अपनी मां से मिला, मेरी मां से बढ़कर मुझसे कोई प्यार नहीं करता.
इमाम अली ने फ़रमाया ऐ शख्स बताओ!
अगर तुम्हारी तकदीर तुम्हारी मां लिखती तो क्या बुरा लिखती?
तो वो कहने लगा नहीं मेरे मौला
मेरी मां तो हर कदम कदम पर सिर्फ मेरी क़ामयाबी लिखती.
तो इमाम अली ने कहा ऐ शख्स तुम्हारा खालीक़ 70 मां से ज्यादा तुमसे प्यार करता है, वो तुम्हारे लिए नुकसान कैसे लिख सकता है.
देखो इस दुनिया को,  जहां कदम कदम पर सिर्फ फसाद, नुकसान, शर मिलता है,
अगर अल्लाह इंसान को खुद मुख्तार नहीं बनाता तो क्या तुम्हें लगता है! वो खुद अपने हाथों से अपनी ही जमीन को ऐसा करता, फसाद करता, नुकसान करता.
सोचो अल्लाह ने एक दिन रखा जिसको क़यामत कहते हैं,
अगर हर गुनाह और शबाब इंसान से अल्लाह ही करवाता, तो फिर रोजे मेहशर का हिसाब व किताब क्यों रखता.
बताओ! वह शख्स शर्मसार होने लगा.
इमाम अली ने फ़रमाया क़यामत के दिन हिसाब व किताब इस तराजू में तोला जाएगा के जब तुम्हारे खालिक ने तुम्हें इतनी नेमतें दी, तुम्हारी तकदीर में तुम्हारी मंजिल लिखी, तो तुमने अपना ही नुकसान क्यों किया,
तुमने अपनी ख्वाहिशात के पीछे भाग भाग कर दूसरों पर जुल्म क्यों किया, उसी जुल्म का हिसाब व किताब होगा.
तकदीर में हर इंसान कामयाब है, लेकिन इंसान के गलत फैसले इंसान की क़ामयाबी नसीब होने नहीं देते.
ऐ शख्स तुम्हारा नुकसान तुम्हारी तकदीर में नहीं था, बल्कि तुम्हारी गलत फैसलों की वजह से तुम्हें यह नुकसान नसीब हुआ, इसीलिए नसीब होने को नसीब और तुम्हारे मंजिल को तकदीर कहते हैं.
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