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Gusse Ko Control Kaise Kare – मुझे गुस्सा बहुत आता है.

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इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु खुत्बा दे रहे थे, तो इतने में एक शख्स हज़रत इमाम अली को देखने लगा, इमाम अली ने जैसे ही अपने मुबारक निगाहों से उस शख्स को देखा, तो फ़रमाया, ऐ अल्लाह के बंदे तुम कुछ पूछना चाहते हो, तो उस शख्स ने कहा या अली पूछना तो चाहता हूं लेकिन सोचता हूं पूछूं ना पूंछ, तो इमाम अली ने फ़रमाया, ऐ बंदा ए खुदा जो जी चाहे पूछो, क्योंकि मैं ज़मीन के रास्तों से ज़्यादा आसमान के रास्ते जानता हूं, उस शख्स ने कहा या अली!
मुझे गुस्सा बहुत आता है, मैं दिल का बुरा नहीं हूं, लेकिन बस इसी वजह से मेरे दोस्त मेरे रिश्तेदार सब मुझसे दूर हो गए, तो इमाम अली ने फ़रमाया, ऐ शख्स याद रखना, जिस शख्स के दिल और ज़ुबान में फासला ना हो, और दिल में पाखंड ना रखता हो वह फौरन गुस्सा करके कह देता है,
लेकिन तुम्हारा गुस्सा करने की वजह से तुम्हारा अखलाक़ (नैतिकता) तुमसे दूर हो रहा है, और यह याद रखना हर रिश्ता अखलाक़ (नैतिकता) से जुड़ा हुआ है, अगर तुम्हारे अल्फाज मीठे नहीं, अगर तुम्हारे लहजे में मोहब्बत नहीं, तो कोई भी तुम्हारा नहीं होगा,
बस यह कहना था तो वह शख्स रोने लगा, तो इमाम अली ने कहा तुम रोअो नहीं, अगर तुम चाहते हो कि तुम्हें गुस्सा ना आए, अगर तुम्हें गुस्सा खड़े हुए आ जाए तो बैठ जाओ, अगर बैठे हुए आ जाए तो सो जाओ, अगर घर में हो तो बाहर चले जाओ, अगर बाहर हो तो किसी दरख़्त के साए में बैठ जाओ, और मुठी को तेज बंद कर लो और एक एक उंगली खोलती जाओ और ये कहते जाओ,
ऐ अल्लाह मोहम्मद और अली मोहम्मद पर रहमत नाजिल फ़रमा,
ऐ अल्लाह मोहम्मद और अली मोहम्मद पर रहमत नाजिल फ़रमा,
जब पांचों उंगलियां खुल जाए तो देखना तुम्हारा गुस्सा खत्म हो जाएगा.

Ghar ke sukun ki Dua, as Imam Ali:

http://www.achhilekh.com/gusse-ko-control-kaise-kare-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%81%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b9/

इमाम अली की ख़िदमत में एक शख्स आया और अर्ज करने लगा, या अली “घर में बेसुकूनी सी पाई जाती है, न रिज़्क़ में बरकत है, ना खुशहाली है” कोई अमल, कोई दुआ, कोई भी चीज बताएं जिससे मेरा घर खुशहाल हो जाए,
तो इमाम अली इब्ने अबी तालिब रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु ने फ़रमाया,
अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारे घर में सुकून पाया जाए, तुम्हारे रिज़्क में बरकत हो जाए, तुम्हारे हालात ठीक हो जाए “तो तुम मुसलसल अपने बुजुर्गों के लिए, मरहूमीन के लिए इसाले सवाब करते रहो”
तो उसने अर्ज किया या अमीरुल मोमिनीन न मेरे पास इतना वक्त है कि अपने वालीदैन की नमाज़ काजा पढ़ु, और ना ही मेरे पास इतने पैसे हैं कि गरीब को खाना खिलाकर उसका इसाले सवाब अपने वालीदैन( मां बाप) के लिए पेश करूं,

इमाम अली ने उस शख्स को देखा और फ़रमाया, अल्लाह के नजदीक तादाद नहीं बल्कि नियत देखी जाती है, ऐ बंदे ए खुदा अगर तुम ये इमान रखते हो, तो जो भी इसके अलावा रखा हो तो उस पर एक मर्तबा सूरह फातिहा और 3 मर्तबा सूर्य अख़लास पढ़ कर अपने मरहूमीन के लिए इसाले सवाब के लिए दुआ करो,
अल्लाह तुम्हारे मरहूमीन की मगफिरत फरमाएगा, और उनके सदके तुम्हारे घर के हालात बेहतर करेगा,

क्योंकि जो मरहूमीन बरजख में है, वो तुम्हारे हालात के लिए दुआ करेंगे, तो अल्लाह कभी भी वालीदैन की बरजख़ से दुआ रद्द नहीं करता,

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