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Imam Musa A Kazim Aur Bhukha Sher, ijzat Aur jillat Allah ke haath hai

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इमाम मूसा ए काजिम रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु को वक्त के जालिम बादशाहों ने हमेशा कैद में रखा, क्योकिं वो जलते थे, ह़सद करते थे कि हुकूमत हमारी, दौलत हमारी, बादशाह हम हैं लेकिन फिर भी लोग, इन फटे पुराने लिबास में रहने वाले सादात की इज्ज़त क्यों करते हैं.

बस एक मर्तबा जालिम बादशाह ने सोचा, कुछ ऐसा करें कि मूसा ए काजिम शहीद भी हो जाए, और उसका इल्जाम भी मुझ पर ना आए.

बहुत गौर व फिक्र के बाद किसी ने ये मशवरा दिया, ऐ बादशाह ऐसा करते हैं जंगल से कुछ शेर पकड़ते हैं, और उस शेर को सात दिन तक भूखा, प्यासा रखते हैं, और जब वो हद से ज्यादा भूखे हो तो उस वक्त हम मूसा ए काजिम से कहेंगे के आप नवासा ए रसूल है, इमाम अली के पोते हैं, आपसे बेहतर इल्म वाला कौन होगा, हमें यह बताएं कि ईन शेरों में से आला नस्ल की शेर कौन सा है,
इमाम को अंदर भेजेंगे, और भूखे शेर इमाम को खा जाएंगे, और फिर लोगों से कहेंगे कि हमें क्या मालूम कि शेर इमाम को खा जाएंगा, हम तो इनको रसूल अल्लाह का नवासा समझते थे,
इनसे इमाम मूसा ए काजिम के इज्ज़त भी कम हो जाएगी, और वो शहीद भी हो जाएंगे,

बस शेरों को पकड़ा गया और उनको सात आयाम (दिन रात) तक भूखा प्यासा रखा गया, इमाम मूसा ए काजिम रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु को ये हुक्म दिया गया,
के वो शेरों को पिंजरे में जाएं और हमें यह बताएं कि इनमें आला नस्ल की शेर कौन है.

हज़रत इमाम मूसा ए काजिम रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु को जैसे ही उस पिंजरे में डाला गया, लोग दूर से तमाशा देखने लगे, एक तरफ रसूल अल्लाह का नवासा इमाम मूसा ए काजिम था, तो दूसरी तरफ वो भूखा शेर,
शेर करीब आने लगे सब खुश होने लगे कि अभी खा जाएंगे,
इतने में तमाम शेर हज़रत इमाम मूसा ए काजिम के कदमों पर सर रखकर ताज़िम से बैठ गए, और इमाम! उन तमाम शेरों के सर पर हाथ घुमाने लगे, सब देख कर हैरान हो गए के ये इतने दिनों से भूखे शेर मूसा ए काजिम को खा क्यों नहीं रहे,

बस इमाम ने उस बादशाह की तरफ देखा और कहां की इज्ज़त और जिल्लत अल्लाह के हाथ है. फिर फ़रमाया ऐ बादशाह कहलाने वाले,
यह तमाम शेर आरा नस्ल के हैं, क्योंकि जो हमें पहचानता है, हमें जानता है, वो कभी कम नस्ल के हो नहीं सकता,
वह बादशाह निराश होने लगा, और लोग रसूल अल्लाह के आल पे औलाद पर दुरूद सलाम भेजने लगे, सलाम हो नवासा ए रसूल इमाम मूसा ए काजिम पर.

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