मर्द और औरत में क्या फर्क है|What is the difference between a man and a woman

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मर्द और औरत में क्या फर्क है|What is the difference between a man and a woman in hindi.

मर्द और औरत में क्या फर्क है?मर्द के अंदर शुजाअत बहादुरी बुलंद हौसला होता है.
अल्लाह ने हर खिलक़त को अदल की तराजू में तौल की राह बख्शी है.
और मर्द को सुजाअत बहादुरी ह़ील्म और ह़ीकमत के मीट्टी से बनाया ताकि मर्द दुनिया में अपने घर की हिफाज़त कर सकें.
और औरत के अंदर प्यार मोहब्बत एहसास रहम पाए जाते हैं.
आज हम इस लेख में जानेंगे मर्द और औरत के बारे में कि इन दिनों में क्या फर्क है.
यह दोनों कीस तरह सोचते हैं मर्द के सोच कैसा होता है,और औरत की स कैसे होती है. इस लेख में कुछ बातें जानेंगे,तो चलिए शुरू करते हैं
इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु के खिदमत में एक शख्स आया और अर्ज़ करने लगा या अली,मर्द और औरत में क्या फर्क है?( What is the difference between a man and a woman)
उनकी सोच में क्या फर्क है.
तो इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु ने फ़रमाया ऐ शख्स,अल्लाह ने हर खिलक़त को अदल की तराजू में तौल की राह बख्शी है.
हर मख़लूक़ को किसी न किसी मकसद के तहत बनाया गया है और उसे ऐसी ऐसी चीजें इनायत की गई है.जिससे वह अपना काम बेहतर कर सकें.
जैसे की गोश्त खाने वाले जानवरों के दांत नोकिले रखे हैं,ताकि वह आसानी से गोश्त खा सकेंं, शिकार कर सकें.
और घास खाने वाले जानवरों के दांत सीधे रखें हैं ताकि वह आसानी से घास खा सकें.
वैसे ही औरत के वजूद में प्यार एहसास रहम उम्मीद ख्याल भर दिया है,ताकि औरत अपने घर का ख्याल रख सके,अपने औलाद से प्यार कर सके,अपना मर्द की फिक्र कर सकें,अपने घर को संभाल सके.
और मर्द को सुजाअत बहादुरी ह़ील्म और ह़ीकमत के मीट्टी से बनाया ताकि मर्द दुनिया में अपने घर की हिफाज़त कर सकें, अपने घरवालों की ख्वाहिशात पूरी कर सके.
औरत अपनी जिंदगी के फैसले किसी न किसी एहसास के साथ करती है.
कभी रहम मे, कभी प्यार में, कभी भरोसे में,
और मर्द अपनी जिंदगी के अहम फैसले तजुर्बात के बिना पर किया करते हैं.
औरत का दिल औरत की वजूद पर हावी होता है.
और मर्द का दिमाग मर्द के वजूद पर हावी होता है.
लेकिन अफसोस तो यह है कि एक ज़माना ऐसा आएगा जिसमें औरतें मर्द का लिबास पहन लेगी.
और औरत मर्द की तरह सोचेगी.
उस शख्स ने कहा या अली यह हमें कैसे पता चलेगा कि यह औरत होकर भी मर्द की तरह सोचती हैं,या यह मर्द होकर भी औरतों की तरह सोचता है.
तो इमाम अली रज़ि अल्लाहु ताअला अन्हु ने फ़रमाया ऐ शख्स याद रखना!
जो मर्द अपने जिंदगी का फैसला किसी न किसी एहसास के साथ करता हो.
और अपने तजुर्बात को पस्त समझ कर अपने दिल का गुलाम बनता हो.
तो समझ लेना यह जिस्म तो मर्द का लगता है, लेकिन इसकी सोच औरतों की तरह है.
लेकिन जो औरत अपनी जिंदगी के अहम फैसले तजुर्बात की बुनियाद पर करने लगे, और अपने एहसास को अपना गुलाम बनाए तो समझ लेना यह जिस्म तो औरतों की रखती है, लेकिन इसकी सोच मर्द जैसी है.
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