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जीवन में कई बार हमारे निर्णय हमारे लक्ष्य के अनुसार नहीं होते।

जीवन में कई बार हमारे निर्णय हमारे लक्ष्य के अनुसार नहीं होते

जीवन में कई बार हमारे निर्णय हमारे लक्ष्य के अनुसार नहीं होते

ऐसे निर्णय ज्यादा दिनों तक नहीं टिकते और जल्दी ही भुला दिए जाते हैं; किंतु जो निर्णय उद्देश्यों को ध्यान में रखकर लिये जाते हैं, वे याद रहते हैं; क्योंकि वे आपके लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। —रे स्टेनडॉल यदि हम समय को लंबाई में नापें तो यह तीन श्रेणियों में विभाजित होता दिखाई पड़ता है—भूत, वर्तमान व भविष्य। भूत की परिभाषा ऐसे दी जा सकती है कि बीता हुआ वह समय, जिसमें हम यह आकलन कर सकते हैं कि जीवन में किन विकल्पों के चुनाव ने हमारे वर्तमान को सँवारा है—पश्च दृष्टि। भविष्य को ऐसे परिभाषित कर सकते हैं—आगे आनेवाले समय में मानसिक स्तर पर पहुँचकर यह चिंतन करना कि आज के समय में निर्णयों के कौन से चयन सकारात्मक नतीजे लाएँगे—दूरदर्शिता। वर्तमान वह समय, जो चल रहा है और वास्तविक अर्थों में ‘सच्चा’ कहा जा सकता है। वर्तमान हमारे लिए ढेरों खुशियाँ ला सकता है, यदि उस वर्तमान को हम अंतर्दृष्टि से जोड़कर देखें। अंतर्दर्शन ऐसा गुण है, जो हमें अपने अंदर झाँकने को प्रेरित करता है कि कौन से सबक हमारे वर्तमान को सुखद बनाने के लिए प्रासंगिक हैं। भौतिक दृष्टि से हम घड़ी में समय देख सकते हैं, कालानुक्रमिक सूची (कैलेंडर) को आगे बढ़ा सकते हैं, (तारीख के अनुसार) अपने अनुभवों का प्रलेखन कर सकते हैं और समय का अवलोकन भी; किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से समय की समझ भिन्न होती है। वह चक्राधार होती है। हम अपने मस्तिष्क में संपूर्ण जीवन का एक तरह से चलचित्र देख लेते हैं। हमारे सारे संबंध व अनुभव हमारे भीतर ही रहते हैं और सत्य से पोषित होते हैं। कभी-कभी ये अनुभव आपस में इतने उलझ जाते हैं कि कालक्रम अस्पष्ट हो जाता है। हम स्वप्न में कभी खुद को बच्चा और अपने बच्चों को अपने साथियों के रूप में देखते हैं। कभी बहुत पुरानी घटना को वर्तमान स्थान व परिवेश में देखते हैं। यह पागलपन नहीं, बल्कि मस्तिष्क का सभी अनुभवों को अर्थ व विवेक-सम्मत करने का प्रयास है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो समय है, वह है, जो चल रहा है। इनमें भूत, वर्तमान, भविष्य जैसा कुछ नहीं है, कोई भेद नहीं है। समय जैसा है, वैसा ही है। इससे स्पष्ट है कि किस प्रकार स्वप्न में दिखाई देनेवाली घटनाएँ एक-दूसरे में मिल जाती हैं और घटनाओं का कालक्रम टूट जाता है। यह सभी कुछ सोचने व चिंतन के स्तर पर तो ठीक लगता है, किंतु जीवन की सच्चाई में जीने के लिए, मेले में, कदम से कदम मिलाकर तो चलना ही पड़ेगा। यही कारण है डॉ. नेपोलियन हिल समय का समझदारी व निपुणता-युक्त उपयोग करने को कहते हैं। समय हमारे अस्तित्व का अर्क है और समय-क्षेत्र से बाहर निकलते ही हमारी पहचान खत्म हो जाती है। यदि हम जिंदगी को शतरंज की बिसात समझें तो समय हमारा प्रतिद्वंद्वी है। अपनी बेहतरीन चाल चलिए और बाजी को अपनी तरफ मोड़ लीजिए। याद रहे, समय किसी के लिए नहीं रुकता। इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए अपनी अंतर्दृष्टि को जाग्रत् करें और जीवन में सफलता एवं उपलब्धियों के लिए समय का बुद्धिमत्तापूर्वक प्रयोग करें। समय में छुपा अवसर —डॉ. नेपोलियन हिल अगली बार जब आपको यह लगे कि समय और अवसर के इस बहुमूल्य कर्ता का आप दुरुपयोग कर रहे हैं, उसी समय अपने संकल्प को दोहराइए, मन-मस्तिष्क में बिठाइए और तुरंत ही कार्य आरंभ कर दीजिए। मेरा समय-चिकित्सक के प्रति वचन 1. समय ही मेरी असली संपत्ति एवं धन है। मैं स्वयं को इसकी बजट-व्यवस्था से जोड़ूँगा और अथक प्रयास करूँगा कि जाग्रत् अवस्था (जब सोए न हों) का प्रत्येक क्षण मैं स्वयं के सुधार में लगाऊँ। 2. भविष्य में मैं समय के दुरुपयोग को अपराध समझ उसके लिए

जीवन में कई बार हमारे निर्णय हमारे लक्ष्य के अनुसार नहीं होते।

प्रायश्चित्त करूँगा/करूँगी और उस क्षतिपूर्ति की भरपाई करने की कोशिश करूँगी/करूँगा। 3. इस बात की सत्यता को मानते हुए कि ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’, मुझे केवल सेवा के बीज बोने हैं और इस प्रकार मैं स्वयं को ‘क्षतिपूर्ति नियम’ की राह पर बिछा दूँगा/दूँगी। 4. मैं अपने समय का इस प्रकार से प्रयोग करूँगा कि भविष्य का आने वाला प्रत्येक दिन मेरे लिए ‘मन की शांति’ लाए और यदि ऐसा न हो तो मैं समय का स्व-विश्लेषण के लिए प्रयोग करूँगा/करूँगी कि मेरा मार्ग कहाँ गलत है।

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5. यह जानते हुए कि मेरे सोचने की आदत ही या मेरे विचार ही प्रतिमान बन जाएँगे और वे उन परिस्थितियों को अपनी ओर आकर्षित करेंगे, जो मेरे जीवन के कालक्रम को प्रभावित करेंगी, मैं इस बात का ध्यान रखूँगा।/रखूँगी कि मैं अपने मस्तिष्क को इतना व्यस्त रखूँ, ताकि मैं अपनी मनचाही परिस्थिति को ही आकर्षित करूँ और अपना वक्त डर व कुंठा जैसे मनोविकारों को पोषित करने में व्यर्थ न गँवाऊँ। 6. इस बात का बोध रखते हुए कि मेरे पास धरती पर रहने का समय अनिश्चित व सीमित है, मेरा प्रयास रहेगा कि मैं अपने हिस्से के समय को अपने प्रियजनों के लिए प्रयोग में लाऊँ। वे मेरे जीवन के उदाहरण से प्रभावित व प्रेरित

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होकर स्वयं के समय का सदुपयोग करें। 7. अंततः जब मेरी जीवन-लीला समाप्त हो जाए तो मैं लोगों के दिलों में ऐसा स्मारक खड़ा कर जाऊँ, जिसे देखकर यह निश्चित हो सके कि मेरा जीवन सार्थक हुआ और मेरे कर्मों ने विश्व को थोड़ा सा और जीने लायक स्थान बनाया। 8. मैं जब तक जीवित हूँ, स्वयं को यह वचन रोज याद दिलाऊँ और उसमें अखंड विश्वास भी रखूँ कि यह वचन मेरे चरित्र का सुधार व उद्धार करेगा और दूसरों को उनके जीवन में सुधार लाने को प्रेरित करेगा।

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