History in Hindi

शहाबुद्दीन गौरी और पृथ्वीराज का घमासान लड़ाई एक ऐतिहासिक जंगी वाक्या

शहाबुद्दीन गौरी और पृथ्वीराज का घमासान लड़ाई एक ऐतिहासिक जंगी वाक्या

शहाबुद्दीन गौरी सन 1160 ईस्वी को अफगानिस्तान के इलाक़े गौर के में पैदा हुए. शहाबुद्दीन गौरी सल्तनत ए गौरिया का दूसरा हुक्मरान था.

सैफुद्दीन गौरी के इंतकाल के बाद शहाबुद्दीन गौरी के भाई गयासुद्दीन सल्तनत ए गोरिया के तख्त पर बैठा. और उसने 1173 में गजनी को मुस्तकिल तौर पर फतह करके उसने शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी को गज़नी में तख्त पर बिठाया.

गयासुद्दीन ने इस दौरान हीरात और बलख में भी फतह कर लिया, और हीरात को अपना दारुल हुकूमत बनाया, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी अगरचे अपने भाई का नायब था, लेकिन उसने गजनी में एक आजाद हुक्मरान की तरह हुकूमत की.

और मौजूदा पाकिस्तान और सुमाली हिंदुस्तान को फतह करके तारीख में मुस्तकिल मकाम पैदा कर लिया, अपने भाई गयासुद्दीन के इंतकाल पर वह पूरी गौरी सल्तनत का हुक्मरान बन गया.

शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के फ़ौजी करवाही, पाकिस्तान के इलाके से शुरू हुई वह दरेगोमल से पाकिस्तान में दाखिल हुए, उसने सबसे पहले मुल्तान और ऊच पर हमला किया.

शहाबुद्दीन गौरी ने 1175 में मुल्तान और ऊच दोनों फतह कर लिए, उसके बाद 1179 में पेशावर और 1185 में देवल को फतह कर लिया, इस तरह उन्होंने गोरी हुकूमत को बाहरी अरब के शाहील तक पहुंचा दिया.

लाहौर और उसके आसपास का इलाका उस वक्त तक गजनी खानदान के कब्जे में था। शहाबुद्दीन गौरी ने 1186 में लाहौर पर हमला करके उसने गजनी खानदान की हुकूमत को बिल्कुल खत्म कर दिया.

लाहौर पर कब्जा करने के बाद वह भटिंडा की तरफ बढ़ा और वहां भी अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ दिए.
उस वक्त दिल्ली और अजमेर पृथ्वीराज चौहान की कब्ज़े में था.

पृथ्वीराज चौहान ने जब यह सुना कि शहाबुद्दीन गौरी ने भटिंडा फतह कर लिया है, तो वह दो लाख की जबरदस्त फौज लेकर शहाबुद्दीन गौरी से लड़ने के लिए निकला,
दिल्ली के शुमाल मगरीब में करनाल के करीब एक मैदान में दोनों तरफ की फौज में घमासान की लड़ाई हुई.

इस लड़ाई में शहाबुद्दीन गौरी के कलील फौज की शिकस्त हुई,और वह बुरी तरह जख्मी हो गया, जख्मी हालत में एक सिपाही ने उसको बचाकर मैदान-ए-जंग से ले गया.

सिपाही अपने जरनल शहाबुद्दीन गौरी को
ना देखकर बुजदिल हो गए और मैदान-ए-जंग से भाग निकले.

इधर शहाबुद्दीन गौरी को जख्मी हालत में लाहौर लाया गया, जहां से उसे गजनी पहुंचाया गया.

शहाबुद्दीन गौरी को इस शिकस्त का कितना रन्ज हुआ कि उसने 1 साल तक हर तरह की ऐश व आराम को छोड़कर बेचैनी की जिंदगी गुजारी.
यहां तक कि उसने अपने जरनैल से भी बात करना छोड़ दिया था.

फिर उसने अपने तमाम जरनैल को तरबीयत यफता फौज तैयार करने का हुक्म दिया.
कुछ अरसा बाद एक लाख बीस हजार सिपाहियों पर मुसतमील एक बहुत बड़ी फौज लेकर पिछले शिकस्त का बदला लेने के लिए.

दिल्ली की तरफ रवाना हुआ, उधर जब पृथ्वीराज को पता चला तो उसने भी भारत के ढाई सौ राजाओं की मदद से तीन लाख से ज्यादा फौज और कई हजार जंगी हाथी जमा कर लिए.
और जंग के लिए रवाना हुआ.

दोनों तरफ की फौज एक बार फिर
तराइन अतरौली के मैदान में आमने-सामने हुई.

पृथ्वीराज चौहान ने शहाबुद्दीन गौरी को एक खत लिखा और नसीहत की अपने सिपाहियों के हाल पर रहम खाओ और उन्हें लेकर गजनी वापस चले जाओ हम तुम्हारी जान बख्श देंगे और पीछा नहीं करेंगे.

लेकिन शहाबुद्दीन गौरी ने निहायत जूर्रतमंदाना जवाब दिया के वह अपने भाई के हुक्म के मुताबिक अमल करता है.

इसलिए बगैर जंग की वापसी मेरे लिए नामुमकिन है अगले दिन दोनों फौज का आमना सामना हुआ एक बार फिर घमासान की लड़ाई शुरू हुई.

पृथ्वीराज के तीन लाख से ज्यादा फौज के मुकाबले में शहाबुद्दीन गौरी की एक लाख फौज मदे मुकाबिल थी.

जंग सूरज निकलने से पहले शुरू हुई शहाबुद्दीन गोरी के फौज इतनी जवान मर्दी से लड़ी कि पृथ्वीराज की फौज की कदम डगमगाने लगी शाम होने से पहले पहले जंग का नतीजा सामने आ चुका था.

शहाबुद्दीन गौरी को फतह हासिल हुई और पृथ्वीराज की शिकस्त हुई पृथ्वीराज ने मैदान-ए-जंग से भाग कर अपनी जान बचाई.
मगर दरिया ए सरस्वती के पास से गिरफ्तार हुए.

उसके बाद सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी के हुकुम पर उसे क़त्ल कर दिया गया,पृथ्वीराज को शिकस्त देने के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने दिल्ली और अजमेर को भी फतह कर लिया.

और उसके सिपासलार मलक मोहम्मद इब्ने बख्तियार खिलजी ने आगे बढ़कर बिहार और बंगाल को भी फतह कर लिया.

इस तरह शहाबुद्दीन गोरी ने एक अज़ीमोशान सल्तनत की बुनियाद रखी…

1206 में पंजाब में बगावत शुरू हुई शहाबुद्दीन गौरी फौरन पंजाब आया और बगावत को कुचल कर वापस जा रहा था,के रास्ते में दरिया के किनारे,उन पर एक हमला किया गया.यह हमला जानलेवा साबित हुआ और युं हिंदुस्तान की तारीख में एक नया बाब रकम करके इस दुनिया ए फानी से रुखसत हो गए.

वफात के बाद उनके वफादार गुलाम और नायब कुतुबुद्दीन ऐबक ने
एक मुस्तकिल इस्लामी हुकूमत यनि सल्तनत दिल्ली को खानदाने गुलमा के ज़ेरे असर कायम कर ली.

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